सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में 19 जून 2026 को दिए अपने एक लैंडमार्क जजमेंट में Right to Walk safely on footpaths यानि कि पैदल लोगों के चलने के लिए लिए अलग से बनाए फुटपाथ पर सुरक्षित चलने के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 19 (1)(d) के तहत ‘जीवन के मूल’ अधिकार में शामिल माना है। केस का नाम है Maniyar Iliyaz @ Shaik Riyaz & Anr. v. P. Ayyappan & Ors. संक्षेप में मनियार इलियाज़ केस।

वाह जनाब फैसला तो बहुत ही अच्छा दिया आपने, किन्तु एक आग्रह है। फैसला के साथ सड़क और फुटपाथ भी दे देते। सारे देश की बात तो छोड़िए। जहाँ बैठ कर आप फैसला दे रहे थे उसी दिल्ली में, उसी कोर्ट से कुछ किलोमीटर आगे-पीछे, चमचमाती लुटियन्स सड़कों के पीछे एक बार देख लेते।
चलिए आपको आपके कोर्ट से मात्र 14 किमी की दूरी पर स्थित दिल्ली के सबसे घने आबादी वाले क्षेत्र बुरारी के सड़कों का एक झलक दिखलाती हूँ। दूसरे जगहों पर भी आपको मिलते-जुलते हालत ही मिलेंगे।
हाँ तो रिंग रोड पर बुरारी के फ़्लाइओवर/क्रॉसिंग से लगभग 700-800 मीटर दूर एक कॉलोनी है, बंगाली कॉलोनी। बगल से ही सरकार का नाला रूपी नहर बह रहा है। वर्षों पहले एक बार सरकार को ध्यान आया कि इस क्षेत्र में एक ‘कचरा घर’ बनना चाहिए। पता नहीं किस स्टडी के बाद इसके लिए मेन रोड के बगल में नाला के किनारे घनी आबादी वाले बंगाली कॉलोनी के बाहर कचरा घर बनाने का निर्णय हुआ। जनता ने इस निर्णय का विरोध करते हुए प्रदर्शन आदि किया। कुछ असर नहीं होना था, नहीं हुआ। कचरा घर वहीं बना।
अब सारे बुरारी से कचरा लाकर पहले वहाँ डाला जाता है। फिर वहाँ से उठा कर कहीं और ले जाया जाता है। पास के ही झरोदा डेयरी के बूढ़े मवेशी, जिन्हें उनके पालनहार अब ज्यादा भाव नहीं देते, उन कचरों के ढेर के पास खाने के तलाश में रहते हैं। यहाँ लगने वाले ट्रैफिक जाम का एक बड़ा कारण यह कचरा घर, कचरा उठाने वाली गाडियाँ, और लावारिस मवेशी होते हैं।
इससे भी बड़ी बात यह कि कचरे के ढेर से उड़ कर पोलिथीन आदि कचरा कॉलोनी के खुले नालियों में जाता है। नाली जाम हो जाता है। उसे साफ करने के लिए एमसीडी के लोग आते हैं, जो कि कांट्रैक्ट के सब कांट्रैक्ट से आए हुए होते हैं। ये गंदगी को निकाल कर सड़क पर छोड़ देते हैं, ताकि सूख जाने के बाद उसे ले जाएंगे क्योंकि गीला कचड़ा ले जाना मुश्किल होता है। लेकिन इसे ले नहीं जाया जाता है। यह फिर सूख कर उसी खुली नाली में गिर जाता है। सड़क पर रह जाते है, सूखे हुए कीचड़ जो कि मिट्टी बन जाती है। धीरे-धीरे यह मिट्ठी गाड़ियों के पहियों से लग कर धूल के रुप में हवा में उड़ती रहती है। प्रदूषण के मौसम में सरकार निर्माण कार्यों पर रोक लगा देती है लेकिन ये धूल यूं ही उड़ती रहती है।
अब कॉलोनी से मुख्य सड़क पर आते हैं। मुख्य सड़क 100 फुट का है, जिसमें दोनों तरफ मिला कर लगभग 40 फुट पर तो गाडियाँ खड़ी रहती हैं। यहाँ कहीं-कहीं फुटपाथ जरूर बना है। उसे ढंका भी गया है। लेकिन ढंकने वाली पत्थर या सीमेंट की सिल्लियाँ इतने जगहों से टूटी हुए है कि इसमें इंसान तो क्या कई जगह तो रिक्शा भी गिर कर नाली में डूब जाए। कहीं रोड पर निकलते नालियों के पानी से तो कहीं सड़कों के ट्रैफिक से परेशान बाइक सवार उसी फुटपाथ पर बाइक चलाते हैं।
पैदल चलने वाले बेचारे ‘चलने का अधिकार लिए’ कभी फुटपाथ पर तो कभी रोड पर चलने का प्रयास करता रहता है। आखिर जीवन के अधिकार में मौत का अधिकार भी तो शामिल है।
