गाँव के सीमांत पर एक पुलिया थी। यह किसी नहर या नदी पर नहीं बल्कि एक सड़क पर बनी थी। लकड़ी की कच्ची पुलिया। बेचारी कमजोर सी पुलिया। लेकिन यह सड़क के एक तरफ से दूसरी तरफ पानी को आराम से जाने देती थी। फिर…. फिर एक दिन किसी को याद आया कि गाँव का विकास होना चाहिए। विकास फ़ंड में उस पुलिया को पक्का करने की योजना भी थी। मैं बहुत खुश हुई कि अब उस बेचारी कमजोर पुरानी पुलिया के दिन फिरेंगे। पता चला कि पुलिया पक्की बन गई। मैं बड़े उत्साह से उसे देखने गई।

पुलिया सच में पक्की बन गई थी। लेकिन 18-20 फीट से छोटी हो कर अब वह 3-4 फीट की रह गई थी। मेरे साथ एक बुजुर्ग इंजीनियर थे। उन्होने उसे देखते ही कहा “ये क्या किया इन लोगों ने, अब इसके दोनों तरफ के खेत बर्बाद हो जाएंगे।” अपनी बात को और अच्छे से समझाते हुए उन्होने कहा कि किसी पुल को बनाते समय उससे प्रवाहित होने वाली पानी की मात्रा आदि का अध्ययन कर उसकी लंबाई निर्धारित की जाती है। यहाँ पुलिया की लंबाई इतनी छोटी हो गई है कि इससे निकलने वाले पानी का प्रवाह बहुत तेज हो जाएगा जिससे दोनों तरफ के खेतों की मिट्टी कटेगी। उनकी बात सच साबित हुई।
लेकिन कुछ दिनों के बाद वह पुलिया भी सड़क पर नहीं दिखा। पता चला कि पानी निकलने के लिए ‘बम्मा’ (बहुत मोटी सीमेंट की पाइप) लगा दिया गया है। यह ‘बम्मा’ किसी किसान की जमीन से ही जाता और निकलता था। इससे दोनों की खेत बर्बाद होती। किसानों ने मुखिया जी से समाधान पूछा। मुखिया जी ने कहा यह पंचायत की ज़िम्मेदारी नहीं है, अगर आपको दिक्कत होती है तो उसके मुहाने को मिट्टी से भर दीजिए। लोगों ने यही किया। मैंने किसी से पूछा आपने रास्ता बंद कर दिया तो पानी निकलेगा कैसे? उन्होने बड़े मासूमियत से कहा कि पानी तो अपना रास्ता बना ही लेता है, आप उसकी चिंता मत कीजिए।
अब सड़क के एक तरफ के खेत बाढ़ से मरते हैं तो दूसरी तरफ के खेत सूखे से। पास बहने वाली ‘धार’ (छोटी नदी) से आने वाली बाढ़ का पानी ‘विकास’ (सड़क और पक्के घरों) के बीच घिर कर दम तोड़ देता है, उसके लिए प्रतीक्षा करते खेतों तक कभी पहुँच नहीं पाता।
लेकिन सरकार कहती है, उसके रिकॉर्ड कहते हैं, गाँव में पुलिया है, कई बम्मा हैं, और तो और एक पुरानी और एक नई नहर भी है। अब सरकार कहती है तो सही ही कहती होगी। ‘जी जनाब आप सही कह रहे हैं’ पर कभी आपको सड़क पर कोई पुलिया दिखे तो मुझे जरूर बताइएगा।
