हमारे साहित्यकार

मिर्जा गालिब: उर्दू और फारसी के महान शायर

“रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ायलजब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है।” यह पंक्ति

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रामधारी सिंह दिनकर: राष्ट्र कवि

याचना नहीं अब रण होगा, जीवन जय या मरण होगा। जंजीर बढ़ा अब साध मुझे, हाँ हाँ दुर्योधन बांध मुझे।

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