भीष्म साहनी का लेखन
एक गरीब हिन्दू व्यक्ति को एक मुस्लिम व्यक्ति कहता है कि उस वेटेनरी डॉक्टर को देने के लिए एक मृत सूअर चाहिए। अगर वह एक सूअर मार कर उसे दे दे तो वह उसे पाँच रुपए देगा। वह व्यक्ति मान जाता है। बड़ी मुश्किल से रात में वह एक सूअर को मारता है। साथ ही आश्चर्य करता है कि डॉक्टर इस सूअर का करेगा क्या? फिर अपने को तसल्ली देता है कि वह कुछ भी करे, उसे क्या! उसे तो पैसे मिल रहे हैं न। दृश्य बदलता है। सुबह होती है। काँग्रेस प्रभात फेरि लगा रही है। इस फेरि का उद्देश्य होता है हिन्दू-मुस्लिम में शांति स्थापित करना। तभी उन लोगों को मस्जिद की सीढ़ियों पर रखा एक मृत सूअर दिखता है। वे इसका परिणाम सोच कर डर जाते हैं। आपस में सलाह करने लगते हैं उसे वहाँ से हटाना चाहिए या नहीं, इससे पहले कि कोई इसे देख ले। इस निर्णय पर पहुँचते हैं कि इसे हटा देना चाहिए। तभी उन्हें एक गाय के पीछे दौड़ता एक व्यक्ति दिखता है। वे समझ जाते हैं कि परिस्थिति अब उनके हाथ से निकल चुकी है। ‘आकाश में गिद्ध और कौवे लंबे समय तक रहेंगे।’ वह व्यक्ति जिसने इस सूअर को मारा था वह अपनी बेवकूफी पर अपना सिर पीट रहा था। नफ़रतों का दौर एक बार फिर चल पड़ता है।
यह मूल कहानी है ‘तमस’ की। भीष्म साहनी का सबसे प्रसिद्ध उपन्यास। भारत-पाक बँटवारे के समय के पागलपन, तर्क रहित भावनाएँ इत्यादि का जीवंत विवरण भीष्म साहनी के लेखन की विशेषता है जो लोगों को कुछ देर ठहर कर सोचने के लिए मजबूर कर देता है। तमस ही नहीं उनकी अन्य अनेक रचनाएँ भी लोगों की इस मनस्थिति का बड़ा सजीव वर्णन करती हैं। ‘अमृतसर आ गया’ के तीन पठन, सरदार जी, और ‘दुबला-पतला बाबू’ का व्यवहार समझ नहीं आता है कि वे किस बात का प्रतिशोध ले रहे हैं और किस से ले रहे हैं।
भीष्म साहनी के लेखन में ये पैनापन संभवतः इसलिए था कि उन्होने बँटवारे और दंगे के दंश को खुद झेला था। सबकुछ देखा और महसूस किया था। लेकिन उनका यह देखना एक संवेदनशील रचनाकार के तटस्थ दृष्टिकोण से था। इसलिए भुक्तभोगी होने के बावजूद वे किसी एक पक्ष के नहीं होते बल्कि इंसानी त्रासदी को इंसानी नजर से ही देखते हैं धर्म के नजर से नहीं।
इसीलिए उन्हें प्रेमचंद की परंपरा का लेखक माना जाता है। अपनी व्यक्तिगत विचारधारा को उन्होने अपने लेखन में हावी नहीं होने दिया। इसलिए वामपंथी विचारधारा से जुड़े होने के बावजूद उनकी रचनाओं में मानवीय मूल्य ही निरूपित होता रहा।

बहुमुखी प्रतिभा के व्यक्ति
भीष्म साहनी हिन्दी साहित्य के प्रमुख स्तंभों में से थे। वास्तव में वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी से। वे लेखक होने के साथ ही अभिनेता भी थे। उनके उपन्यास ‘तमस’ पर इसी नाम से फिल्म बनी थी। इसमें उन्होने अभिनय भी किया था। सुप्रसिद्ध अभिनेता बलराज साहनी उनके बड़े भाई थे।
व्यक्तिगत जीवन
भीष्म साहनी का जन्म 8 अगस्त 1915 में रावलपिंडी में हुआ था। अँग्रेजी साहित्य में एमए तक शिक्षा उन्होने वहीं लिया था। वह अवैतनिक रूप से शिक्षक का कार्य कर रहे थे। अर्थ उपार्जन के लिए व्यापार करते थे। देश विभाजन के बाद वे भारत आ गए। भारत में पंजाब विश्वविद्यालय से उन्होने पीएचडी की उपाधि ली और समाचार पत्रों में लिखने लगे। साथ ही वे भारतीय नाट्य संघ यानि इप्टा से भी जुड़े। अंबाला एवं अमृतसर में अध्यापन करने के बाद वे दिल्ली विश्वविद्यालय के जाकिर हुसैन कॉलेज में अँग्रेजी साहित्य के प्रोफेसर बने। 1957-1963 लगभग पाँच वर्षो तक वे मॉस्को में फॉरेन लॅग्वेजेस पब्लिकेशन हाउस में अनुवादक के रूप में कार्य करते रहे। इस पद पर रहते हुए उन्होने लगभग दो दर्जन रूसी किताबों का हिन्दी में अनुवाद किया। 1965-1967 तक दो साल तक वे ‘नई कहानियाँ’ नामक पत्रिका का संपादक रहे। वे ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ और ‘एफ्रो एशियन राइटर्स एसोसिएशन’ से भी जुड़े थे। 1993-1997 तक वे साहित्य अकादमी से कार्यकारी समिति के सदस्य रहे।
साहित्यिक योगदान
उनके प्रमुख उपन्यासों में शामिल थे झरोखे, तमस, बसंती, मय्यादास की माडी़, कुन्तो, नीलू निलिमा नीलोफर इत्यादि। मेरी प्रिय कहानियां, भाग्यरेखा, वांगचू, निशाचर आदि उनकी प्रमुख कहानी संग्रह हैं। उन्होने कई नाटक भी लिखा जिनमें हानूश (1977), माधवी (1984), कबिरा खड़ा बजार में (1985), मुआवज़े (1993) विशेष प्रसिद्ध है। उन्होने ‘गुलेल का खेल’ नामक बालकथा भी लिखा। अपनी आत्मकथा का नाम उन्होने रखा था ‘बलराज माय ब्रदर’।
इनके अलावा उन्होने लगभग दो दर्जन रूसी भाषा की पुस्तकों का हिन्दी में अनुवाद भी किया था।
पुरस्कार एवं सम्मान
उपन्यास तमस के लिए भीष्म साहनी को 1975 में साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया। 1975 में ही पंजाब सरकार ने उन्हें शिरोमणि लेखक अवार्ड दिया। 1980 में उन्हें एफ्रो एशियन राइटर्स असोसिएशन का लोटस अवार्ड तथा 1983 में सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड दिया गया। 1998 में में भारत सरकार के उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया।
11 जुलाई 2003 को भीष्म साहनी जी का निधन हो गया। लेकिन अपने पीछे वे एक लंबी साहित्यिक विरासत छोड़ गए।
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