बात वर्ष 1837 की है। इटली के फ्लोरेन्स नगर में इन्फ्लूएंजा महामारी फैली थी। उस समय महामारी में बड़ी संख्या में लोग मारे जाते थे। इसलिए लोग बीमारी से बचने के लिए बीमारों से भी बचते थे। कोई ऐसे बीमारों की सहायता नहीं करना चाहता था। क्या धनी क्या गरीब- महामारी की चपेट में सभी आते जा रहे थे। एक धनी घर के सभी सदस्य भी इन्फ्लूएंजा की चपेट में आ गए थे। केवल दो लोग इससे बचे थे- एक बावर्ची और दूसरा परिवार की 17 वर्ष की एक बेटी। वह लड़की स्वस्थ थी। लेकिन वह बीमारी से बचने के बजाय बीमारों की सेवा करने लगी। अपने परिवार के सदस्यों की ही नहीं बल्कि आसपड़ोस के घरों में जाकर वह सभी रोगियों की देखभाल करती थी। इतने रोगियों के देखभाल के लिए उसने एक डायरी रखना शुरू किया। वह रोगी का विवरण, उसके स्वास्थ्य में उतार-चढ़ाव एवं दी जाने वाली दवाइयों का विवरण रखने लगी।
यहीं से उस 17 वर्षीय किशोरी में बीमारों की सेवा का संकल्प आया। साथ ही इलाज के लिए आंकड़ा संग्रह करने की जरूरत को भी उसने समझा। अपने इस संकल्प को सिद्ध करने के लिए उसने आजीवन विवाह नहीं करने का संकल्प लिया।
इस किशोरी का नाम था फ्लोरेंस नाइटिंगल। उसका जन्म 12 मई 1820 को इटली के फ्लोरेंस नामक नगर में एक धनी परिवार में हुआ था। हालांकि उसके पिता विलियम नाइटिंगल और माँ फेनी नाइटिंगल दोनों ब्रिटिश थे। बेटी का नाम फ्लोरेंस उन्होने अपने शहर के नाम पर रखा था। इस समय लड़कियों को पढ़ने के लिए बाहर नहीं भेजा जाता था। उनसे अपेक्षा की जाती थी कि वे जल्दी ही विवाह कर घर परिवार की ज़िम्मेदारी संभाले। इसलिए पिता ने फ्लोरेंस और उनकी बहन दोनों के लिए घर पर ही शिक्षक द्वारा पढ़ाने का इंतजाम कर दिया। शिक्षक आकर दोनों बहनों को ग्रीक भाषा, इतिहास और काव्य जैसे विषय पढ़ाते थे जो कि उस समय लड़कियों को पढ़ाया जाता था। लड़कियों की रुचि को देखते हुए उन्हें गणित, भौतिकी, और खगोलशास्त्र आदि भी पढ़ाया गया। लेकिन फ्लोरेंस का पसंदीदा विषय था गणित।

इसी समय फ्लोरेंस में वह महामारी फैली जिसकी बात हमने ऊपर की है। महामारी के दौरान फ्लोरेंस में गणित के ज्ञान का दैनिक जीवन में उपयोग को प्रमाणित किया। वह संभवतः पहली व्यक्ति थी जो रोगियों के आंकड़े रखती थी। साथ ही लोगों की सेवा करने का जो जज्बा उसमें था वह भी अधिक निखर कर सामने आया।
24 वर्ष की होते-होते उसने नर्स बनने का पक्का इरादा कर लिया। लेकिन इसका यह इरादा उसके घर वालों को पसंद नहीं आया क्योंकि उस समय नर्स के व्यवसाय को अच्छा नहीं माना जाता था। एक अच्छे घर की लड़की ऐसा करती यह पिता को मंजूर नहीं था। ऊपर से उसने प्रचलित सामाजिक परंपरा से अलग होकर विवाह नहीं करने का भी निश्चय कर लिया था।
परिवार के विरोध के बावजूद फ्लोरेंस ने 1850 में डसेलफोर्ड शहर में क़ैसरवर्थ डेकोनेस इंस्टीट्यूट में चार महीने तक नर्सिंग का कोर्स किया। इसके बाद 1853 में उसने लंदन में बीमार लोगों की देखभाल का अब तक का सबसे उल्लेखनीय कार्य किया। यहाँ से उसकी प्रसिद्धि एक समाजसुधारक और सांख्यिकीविद के रूप में होने लगी।
इसी समय 1854 में रूस और ब्रिटेन के बीच क्रिमिया का युद्ध शुरू हो गया। इस युद्ध में ब्रिटेन के पक्ष में फ्रांस, सारडीनिया और तुर्की भी लड़ रहे थे। युद्ध में घायल सैनिकों की मेडिकल सहायता के लिए ब्रिटेन ने फ्लोरेंस के नेतृत्व में 38 महिला नर्स की टीम को तुर्की के स्कुटारी के सैनिक हॉस्पिटल में भेजा। पर यह केवल नाम के लिए हॉस्पिटल था। यहाँ दवा, जरूरी उपकरण, सफाई और यहाँ तक कि पीने के साफ पानी तक की कमी थी। इस कारण वहाँ के रोगियों में संक्रमण बहुत होता था।
लेकिन फ्लोरेंस ने हार नहीं माना। इन विपरीत परिस्थिति में भी वह सीमित साधनों से रोगियों की सेवा करती रही। उसने सफाई कर बहुत ध्यान दिया। हॉस्पिटल की सफाई और रोगियों एवं उनके इलाज करने वालों के हाथों को धोने पर उसने बहुत ध्यान दिया। इस सबका परिणाम यह हुआ कि हॉस्पिटल में संक्रामण की दर में कमी लाने लगी।
फ्लोरेंस रात को लैंप लेकर रोगियों को देखने जाती थी। धीरे-धीरे रोगियों को भी उस पर भरोसा होने लगा। वे उसका प्रतीक्षा करने लगे। चूंकि रात को जब डॉक्टर चले जाते थे, वह लैंप लेकर आती थी इसलिए रोगियों ने उसे ‘द लेडी विद लैंप’ यानि लालटेन वाली महिला का नाम दे दिया।
रोगी एवं घायल सैनिकों की गुणवत्तापूर्ण देखभाल से उनकी मौतों में कमी आने लगे। वह रोगियों से संबन्धित आंकड़े एकत्रित करती और उनका विश्लेषण करती ताकि उनकी देखभाल और अधिक प्रभावी हो सके। इसके आधार पर उसे कई चार्ट और टेबल (सारणी) भी बनाया। इनमें सबसे प्रसिद्ध हुआ ‘गुलाब चार्ट’। इस चार्ट में रंग संयोजन और पैटर्न के माध्यम से फ्लोरेंस ने आकड़ों के माध्यम से दिखाया कि कैसे हॉस्पिटल में मौतों की कमी से हजारों लोगों की जाने बचाई जा सकती हैं।
इस तरह फ्लोरेंस ने न केवल रोगियों की सेवा किया बल्कि आधुनिक तरीकों से अकड़ों के विश्लेषण के आधार पर वैज्ञानिक तरीके से समाधान करने का तरीका भी बताया। इससे पहले कभी रोगियों के देखभाल के काम को इतनी गंभीरता और क्रमबद्ध तरीके से नहीं किया जाता था।
फ्लोरेंस ने अपने इस आधुनिक नर्सिंग को आगे बढ़ाने के लिए एक पेशेवर नर्सिंग स्कूल खोला। इन स्कूलों में नर्सिंग की जिस प्रणाली को सिखाया जाता था उसे नाइटिंगल प्रणाली कहा गया। इन स्कूलों में हॉस्पिटल में सफाई, सांख्यिकी का व्यवस्थित उपयोग आदि शामिल था। उसने हॉस्पिटल के डिजायन और चिकित्सा उपकरणों को विकसित करने के लिए भी कार्य किया।
इतना ही नहीं नर्सिंग पर फ्लोरेंस ने एक किताब भी लिखा जिसका नाम है ‘नोट्स ऑन नर्सिंग’। उसने नर्सिंग, हॉस्पिटल मैनेजमेंट और ब्रिटिश नारिवाद पर 200 से अधिक पुस्तक, पुस्तिकाएँ और लेख लिखें।
इस तरह फ्लोरेंस नातींगल न केवल एक सफल नर्स बल्कि आधुनिक नर्सिंग की संस्थापक बन गयी। उसके ये कार्य आगे भी जारी रहे। उसने अपना सारा जीवन रोगियों की सेवा को इस तरह समर्पित कर दिया था कि 1861 में जब वह स्वयं गंभीर रूप से बीमार हो गई थी तब भी उसने रोगियों के देखभाल के अपने कार्य को जारी रखा था।
1869 में उन्हें विक्टोरिया ने रॉयल रेड क्रॉस से सम्मानित किया।
13 अगस्त 1910 में लगभग 90 वर्ष की आयु में फ्लोरेंस का लंदन में निधन हो गया। लेकिन आधुनिक नर्सिंग के रूप में उनकी विरासत आज भी है। आज भी राष्ट्रिय फ्लोरेंस नाइटिंगल पुरस्कार नर्सिंग के क्षेत्र का सम्मानित पुरस्कार माना जाता है।
*****
