अमीर खुसरो: तोता-ए-हिन्द 

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नदी किनारे मैं खड़ी सो पानी झिलमिल होय,

पी गोरी मैं साँवरी अब किस विध मिलना होय।

रैन बिना जग दुखी और दुखी चन्द्र बिन रैन,

तुम बिन साजन मैं दुखी और दुखी दरस बिन नैंन।

अंगना तो परबत भयो देहरी भई विदेस,

जा बाबुल घर आपने, मैं चली पिया के देस।

लगभग 1000 वर्ष पहले जब प्रतिष्ठित लेखक संस्कृत, फारसी और तुर्की में लिखने को अपनी शान समझते थे, लेखन में अलंकार और कठिन भाषा का उपयोग विद्वता की पहचान मानी जाती थी, ऐसे में एक कवि-संगीतकार ने प्रेम की भावना को ऐसे साधारण शब्दों में छोटे-छोटे दोहे के रुप में जनता की भाषा ‘खड़ी बोली’ में लिखने की हिम्मत दिखाया।  

लगभग 1000 वर्ष पहले जब हिन्दी भाषा ने खड़ी बोली के रूप में आकार लेना शुरू किया था। सरकार की भाषा इस देश के लोगों की भाषा से अलग थी। तुर्की और फारसी भाषा शासक वर्ग के लिए सम्मान की भाषा थी। संस्कृत देश के उच्च और पढ़े-लिखे वर्गों की भाषा बन कर रह गई थी। देशी-विदेशी की कई संस्कृतियां एवं भाषाएँ आपस में संपर्क में आए। स्वाभाविक रूप से एक-दूसरे को प्रभावित किया। ऐसे समय में देश के विभिन्न भागों में स्थानीय भाषाओं का उद्भव होने लगा। ऐसे समय में ही उत्तर भारत के एक बड़े भाग में एक नई भाषा का उदय हो रहा था। यह अनेक स्थानीय भाषाओं और संस्कृत भाषा के शब्द ले कर एक नया आकार ले रहा था। तुर्की, फारसी एवं अरबी भाषाओं के शब्द भी इसमें आते जा रहे थे। हालांकि इसका स्वरूप बहुत स्पष्ट नहीं था अभी तक, इसके लिए कोई विशेष नाम नहीं था। फिर भी इसका आकार स्पष्ट होता जा रहा था।

बड़े-बड़े विद्वान अभी इस भाषा को सामान्य या अनपढ़ लोगों की बोली ही मान रहे थे। संस्कृत, फारसी और तुर्की भाषा ही विद्वता की प्रतीक थी। हाँ कुछ लोग खड़ी बोली के रूप में इस नए ‘बोली’ को मान्यता देने लगे थे।

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ऐसे समय में एक कवि, शायर, गायक और संगीतकार हुआ। वह सूफी समुदाय से था और कट्टर मुस्लिम विचारों से दूर था। हालांकि उसका परिवार कई पीढ़ियों से दिल्ली दरबार से जुड़ा हुआ था। स्वयं उसने भी 8 सुल्तानों का समय देखा था। लेकिन उसने संभ्रांत और विजेता वर्ग के अहंकार से अपने को दूर रखा। उसने ईमानदारी से स्वीकार किया कि एक शक्तिशाली भाषा उदित हो रही है।

उसका नाम था अबुल हसन यमीनुद्दीन अमीर खुसरो (1253-1325)। अमीर खुसरो संभवतः पहले ऐसे विद्वान थे जिन्होने ‘खड़ी बोली’ को ‘हिन्दी’ कहा। हिन्दी यानि हिंदुस्तान की भाषा। उन्होने अपनी रचनाएँ ‘हिन्दी’, ‘हिंदवी’, और फारसी में की। हालांकि हिन्दी इस समय तक अपने वर्तमान रूप में नहीं आई थी। इसलिए वर्तमान ‘हिन्दी’ भाषा का साहित्य में प्रयोग करने का श्रेय भारतेन्दु हरिश्चंद्र को दिया जाता है। लेकिन खड़ी बोली के रूप में मुख्य धारा में इसे लाने का श्रेय अमीर खुसरो को ही दिया जाता है।

खुसरो के इस प्रयोग को आगे आने वाले सूफी संतों और भक्ति संतों ने बनाए रखा। सुरदास और तुलसीदास सबसे बड़े उदाहरण हैं। तुलसीदास ने अपनी सबसे लोकप्रिय रचना ‘रामचरित मानस’ अवधि मिश्रित खड़ी बोली में ही लिखा था। उस समय के विद्वान लोगों ने इसके लिए उन्हें अधिक सम्मान नहीं दिया था क्योंकि उनके अनुसार संस्कृत विद्वान होने का प्रमाण था। ‘खड़ी बोली’ विद्वानों की ‘भाषा’ भारतेन्दु के बाद ही सर्वसम्मत रूप से स्वीकृत हो सका।

लेकिन ‘बोली’ से ‘भाषा’ बनने में उन सभी का बहुत योगदान रहा जिन्होने इसे सम्मान और आत्मविश्वास से अपनाया और इसे जनता से जुडने का माध्यम बनाया।

अमीर खोसरो ने न केवल ‘हिन्दी’ या ‘हिंदवी’ शब्द का प्रयोग किया बल्कि राजदरबार से संबन्धित होते हुए भी आम जनता के लिए भी लिखा। हिन्दी के पूर्ववर्ती ‘खड़ी बोली’ में उन्होने ‘पहेली’ और ‘मुकरी’ लिखा। इसे उन्होने ‘हिंदवी’ कहा। पहेलियाँ और मुकरियाँ ऐसी रचनाएँ थी जो आम जनता में भी लोकप्रिय हो गई। अभी तक दरबारी कवि शासकों को खुश करने के लिए लिखते थे। लेकिन खुसरो उन कुछ गिने-चुने कवियों में से थे जिन्होने दोनों के लिए लिखा। उन्होने आम जनता से दूरी नहीं रखा। इसीलिए उन्हें ‘तोता-ए-हिन्द’ (हिन्द का तोता) कहा गया। 

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हालांकि खुसरो के बाद आम जनता के लिए पहेली और मुकरी लिखने की परंपरा ज्यादा नहीं चल सकी। अधिकांश लेखकों ने खड़ी बोली में कम रचना की। लेकिन जनता में यह भाषा लोकप्रिय होती गई। सूफी एवं भक्ति संतों ने जरूर खड़ी बोली को अपनाया।

खुसरो कवि होने के साथ-साथ संगीतकार भी थे। कव्वाली जैसे संगीत, सितार जैसे वाद्य एवं इमाम, जिल्फ एवं साजगरी जैसे राग उनकी ही देन है।

फारसी एवं अरबी में गीत की एक शैली थी गजल। गजल एवं गीत की विशेषताओं को मिला कर उन्होने पहेली और दोहा लिखना शुरू किया। उनकी यह शैली बहुत लोकप्रिय हुई। उनकी रचानाएँ आज भी उतनी ही लोकप्रिय हैं; 

‘खुसरो दरिया प्रेम का, सो उलटी वा की धार

जो उबरो सो डूब गया जो डूबा हुवा पार’

अपनी छवि बनाई के मैं तो पी के पास गई,

जब छवि देखी पीहू की सो अपनी भूल गई।

‘छाप-तिलक तज दीन्हीं रे’, ‘जे हाले मिसकीं मकुन तग़ाफ़ुल’, ‘जब यार देखा नैन भर’ जैसे उनके गीत आज भी उतने ही प्रासंगिक लगते हैं।

उतने ही प्रासंगिक उनकी पहेलियाँ लगती हैं:

आप हिलै वह मोय हिलावे।
वाका हिलना मोको भावे॥
हिल-हिल के वह हुआ नसंखा।
ऐ सखी साजन! ना सखी पंखा॥

सेज पड़ी मेरे आँखों आया।
डाल सेज मोहिं मज़ा दिखाया॥
किससे कहूँ मज़ा मैं अपना।
ऐ सखी साजन! ना सखी सपना॥

खुसरो के होली गीत बहुत प्रसिद्ध हैं। डॉ मुजीब ‘दि इंडियन मुस्लिम’ में लिखते हैं “भाषा अवश्य ही ब्रजभाषा की कोमलता और मृदुलता लिए हुए है लेकिन स्वाभाविक और सहजता भी है ‘दैया री मोहे भिजोया री, शाह निजाम के रंग में। कपड़े रंग के कूट न होता है, या रंग में तन को डुबोया री, दैया री मोहे भिजोया री।’

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व्यक्तिगत जीवन

अमीर खुसरो के पूर्वज मध्य एशिया के लाचक नामक समुदाय से थे। वे मूल रूप से तुर्क जाति से थे। उनके कबीले पर जब जंगेज खाँ का आक्रमण हुआ तब वे लोग वहाँ से भाग कर भारत में शरणार्थी के रूप में आ गए। इस समय तक भारत में दिल्ली सल्तनत की स्थापना हो चुकी थी। 1266 में जिस समय ये लोग भारत आए उस समय यहाँ सुल्तान बलबन का शासन था। दिल्ली दरबार में इन लोगों का स्वागत किया गया। खुसरो के पिता सैफुद्दीन लाचन तुर्क थे लेकिन माँ भारतीय मुसलमान थी। वह बलबन के युद्धमंत्री इमादुतुल मुल्क की पुत्री थी। इस कारण इस परिवार का राजपरिवार से जल्दी संबंध बन गया।

अमीर खुसरो का जन्म 1253 ईस्वी में वर्तमान उत्तर प्रदेश के एटा जिले के पटियाली नामक कस्बे में हुआ था। वह जब सात वर्ष के थे तभी उनके पिता की मृत्यु हो गई थी। 

खुसरो में काव्य और संगीत के प्रति प्रेम बचपन से ही दिखने लगा थे। किशोर अवस्था से ही उन्होने कविताएं लिखना शुरू कर दिया था। 20 वर्ष की उम्र तक वे शायर के रूप में प्रसिद्ध हो चुके थे। राज्य दरबार से जुड़े रहने के बावजूद वे हमेशा जनता के भी नजदीक रहे। लोगों के जीवन नजदीक से अनुभव किया। वे पहले मुस्लिम कवि थे जिन्होने हिन्दी/खड़ी बोली के शब्दों का उपयोग अपनी रचनाओं में किया।

यह समय राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से बहुत उथल-पुथल वाला था। यह समस्त परिवर्तन अमीर खुसरो की रचनाओं में देखा जा सकता है।   

चकवा चकवी दो जने इन मत मारो कोय,

ये मारे करतार के रैन बिछोया होय।

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