दुनिया के सबसे अधिक प्रतिभाशाली गणितज्ञों में गिने जाने वाले रामानुजन को ‘द मैन हू न्यू इनफीनिटी’ भी कहा जाता है। आर्थिक तंगी और बीमारी से जूझते हुए हुए भी उन्होने अपने गणितीय प्रतिभा का लोहा दुनिया को मनाया था। मात्र 32 वर्ष का ही जीवन काल उन्हें मिला था। लेकिन इस छोटी जीवन में भी वे अपनी प्रतिभा से सबको चमत्कृत कर गए। वे गणित को अध्यात्म से जोड़ कर देखते थे और अपनी प्रतिभा का श्रेय अपनी कुल देवी को देते थे।
गणित में उनका योगदान
उन्हें गणित की समझ नैसर्गिक रूप से मिली थी। बचपन से ही उन्हें इसमें बहुत अधिक रुचि थी। कोई विशेष शिक्षण-प्रशिक्षण नहीं होने के बाद भी वह गणित के कठिन से कठिन समस्या को अपने नैसर्गिक प्रतिभा से सुलझा लेते थे। उन्होने गणित के अनेक सिद्धांतों की व्याख्या किया और अनेक सूत्र दिए।
उन्होने अपनी छोटी से जीवन काल में गणित के 3,884 प्रमेयों का संग्रह किया। अभी तक इनमें से अधिकांश प्रमेय सिद्ध किए जा सके हैं। इन्होने बीजगणित की मौलिक और अपारंपरिक परिणाम निकाले। उनके इन परिणामों पर आज तक शोध कार्य हो रहे हैं। इनके सूत्रों को क्रिस्टल विज्ञान में प्रयुक्त किया गया है।

11 वर्ष की उम्र में उन्होने एसएल लोनी (S.L. Loney) के गणित के किताब की पूरी मास्टरी कर ली थी। 14 वर्ष की उम्र में उन्हें मेरिट सर्टिफिकेट एवं कई अवार्ड गणित के लिए मिल चुके थे। 1904 में जब उन्होने स्नातक की डिग्री ली। यानि स्कूल के समय में ही इन्होने कॉलेज के स्तर का गणित पढ़ लिया था। हाईस्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद इन्हें गणित और अंग्रेजी मे अच्छे अंक लाने के कारण सुब्रमण्यम छात्रवृत्ति मिली और आगे कालेज की शिक्षा के लिए प्रवेश भी मिला।
उनकी शैक्षणिक उपलब्धियां
गणित के अलावा अन्य विषयों में उनकी अधिक रुचि नहीं थी। इसलिए परंपरागत शिक्षा पद्धति उन्हें पसंद नहीं था। इसी कारण वे 11वीं की परीक्षा में गणित में तो शीर्ष पर रहे पर अन्य विषयों में उतीर्ण भी नहीं कर सके। अतः उन्हें मिलने वाली छात्रवृति रोक दी गई। 1907 में उन्होने फिर से 12वी के लिए प्राइवेट से परीक्षा दिया पर इसमें भी वे उतीर्ण नहीं कर सकें। इस के बाद उन्होने औपचारिक शिक्षा हमेशा के लिए छोड़ दिया।
इंग्लैंड प्रवास
रामानुजन अपने शोध को दुनिया के बड़े जर्नल में प्रकाशित करवाना चाहते थे। लेकिन एक गुलाम देश के कम डिग्री वाले प्रतिभाशाली गणितज्ञ के लिए विदेशी गणितज्ञों का विश्वास जीतना बड़ी बात थी। शुरू में उन्हें भी संकोच होता था। भारत में रहने वाले कुछ गणित प्रेमी लोग, जिन्हें रामानुजन की प्रतिभा पर भरोसा था, ने उनके शोध पत्रों को इंग्लैंड में भेजना शुरू किया। ऐसे ही एक थे प्रोफेसर शेषू अय्यर। उन्होने लंदन के एक प्रोफेसर हार्डी को उनके कुछ सूत्र भेजे। हार्डी उस समय विश्व के जाने-माने गणितज्ञ थे। उनके कुछ गणितीय प्रश्नों का हल रामानुजन ने निकाल लिया था। इसके बाद प्रो हार्डी एवं रामानुजन के बीच पत्र-व्यवहार होने लगा।
प्रो हार्डी रामानुजन से बहुत प्रभावित हुए। उन्हे एक बार विश्व के गणितज्ञों को 100 में कोई अंक देने के लिए कहा गया। उन्होने अधिकांश गणितज्ञों को 100 में से 35 और कुछ को 60 अंक दिए लेकिन रामानुजन को उन्होने 100 में से 100 दिए थे। रामानुज के कुछ शोध कार्य हालांकि प्रो हार्डी को समझ नहीं आया। पर उन्हें इतना समझ में आ गया कि रामानुजन की गणित के प्रति समझ अति दुर्लभ था। वे उन्हें इंग्लैंड बुलाना चाहते थे। एक बार तो रामानुजन ने मना कर दिया। पर बाद में आर्थिक सहायता मिलने के बाद वहाँ जाने के लिए तैयार हो गए। इंग्लैंड जाने से पहले ही उन्होने करीब 3000 नए सूत्र लिख लिए थे।
इंगलैंड में उन्होने प्रो हार्डी के साथ मिलकर कई शोध पत्र प्रकाशित किए जिन पर दुनिया भर के गणितज्ञों का ध्यान गया। एक विशेष शोध के कारण उन्हें कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय द्वारा बीए की उपाधि भी मिली।
लेकिन रामानुजन को वहाँ की जलवायु रास नहीं आया। पहले से कमजोर स्वास्थ्य वहाँ जाकर और भी बिगड़ गया। वहाँ उन्हें क्षय रोग हो गया जिसका उस समय कोई इलाज नहीं हुआ करता था। बीमारी के दौरान जब वे सेनेटोरियम में रह रहे थे उस समय भी उनका गणितीय कार्य चलता रहा।
उनके इन परिश्रम का परिणाम उन्हें मिला रॉयल सोसाइटी की फ़ेलोशिप के रूप में। यह एक बड़ी उपलब्धि थी एक गुलाम देश के अश्वेत नागरिक के लिए। वह इस सोसाइटी के अब तक के इतिहास में फ़ेलोशिप पाने वाले सबसे कम उम्र के व्यक्ति भी थे।
व्यक्तिगत जीवन
22 दिसंबर 1887 को इस महान गणितज्ञ का जन्म तमिलनाडु के कोयंबटूर जिले के इरोड़ नामक कस्बे में हुआ था। परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। उनके पिता साड़ी की एक दुकान पर क्लर्क का काम करते थे। रामानुजन की सबसे बड़ी समस्या थी आय की। उन्हें कोई नौकरी नहीं मिल सकी क्योंकि गणित के अलावा अन्य किसी कार्य में न तो उनका मन लगता और न ही उनसे कोई और काम हो पाता।
1909 में उनकी शादी हो गई। कम उम्र से ही उन्हें स्वास्थ्य संबंधी समस्या शुरू हो गई थी। शादी के अगले साल ही किसी उन्हें शल्यक्रिया की जरूरत हो गई। हालांकि एक डॉक्टर ने उनका निःशुल्क ऑपरेशन कर दिया। लेकिन अब रामानुज को भी लगने लगा कि आय का साधन खोजना चाहिए। नौकरी के कई प्रयास किए। दुकान में बही-खाते संभालने का कार्य किया। ट्यूशन दिया। इन सबसे भी कोई स्थायी आर्थिक आधार नहीं मिला सका, उल्टे उनका स्वास्थ्य ज्यादा खराब होने लगा। पर इस बीच भी वे गणित पर अपना काम करते रहे।
इस दौरान उन्हें कुछ लोग ऐसे लोग मिले जो उनकी प्रतिभा से बहुत अधिक प्रभावित हुए। इनलोगों ने इनकी सहायता भी की। थे। ऐसे लोगों में शामिल थे मद्रास के डिप्टी कलक्टर वी रामास्वामी अय्यर। उन्होने रामानुजन के गणित की प्रतिभा को पहचाना। उनकी सिफारिश पर जिलाधिकारी रामचंदर राव ने उन्हें 25 रुपए मासिक छात्रवृति भी देने का प्रबंध कर दिया। इस छात्रवृति पर रहते हुए उन्होने एक साल में अपना पहला शोध पत्र प्रकाशित किया। इस शोध पत्र का शीर्षक था ‘बरनौली संख्याओं के कुछ गुण।’ जर्नल ऑफ इंडियन मैथेमेटिकल सोसाइटी’ में प्रकाशित हुआ था।
शोध पूरा होने के बाद छात्रवृति बंद हो गई। पर उन्हे मद्रास पोर्ट ट्रस्ट में चीफ अकाउंटेंट के ऑफिस में क्लर्क की नौकरी मिल गई। यहाँ वे ऑफिस का कार्य खत्म कर बचे हुए समय में गणित पर शोध करते।
इसके बाद वे इंग्लैंड चले गए। पाँच वर्षों के बाद गिरते स्वास्थ्य के कारण उन्हें डॉक्टर की सलाह पर भारत लौटना पड़ा। किन्तु यहाँ भी उनके स्वास्थ्य में कोई सुधार नहीं हो सका। इन्हें मद्रास विश्वविद्यालय में प्राध्यापक की नौकरी मिल गई। यहाँ भी वह अध्यापन के साथ-साथ शोध कार्य में भी लगे रहे। बीमारी की हालत में ही उन्होने मॉक थीटा फंक्शन पर एक शोधपत्र लिखा। उनके इस फलन का उपयोग गणित ही नहीं बल्कि चिकित्साविज्ञान में कैंसर को समझने के लिए भी किया जाता है।
लेकिन इस अद्भुत प्रतिभा को अपना योगदान देने के लिए प्रकृति ने अधिक समय नहीं दिया था। 26 अप्रैल 1920 को 32 वर्ष 4 महीने 4 दिन की अल्प आयु में उनका निधन हो गया।
विरासत
रामानुजन अपना शोध कार्य पहले स्लेट पर खड़िया से लिख कर करते फिर इसे वे आपे एक रजिस्टर में लिख लेते जो हमेशा उनके साथ रहता था। 1976 में ट्रिनिटी कॉलेज के एक पुस्तकालय में अचानक उनका एक रजिस्टर मिला। सौ पृष्ठों का यह रजिस्टर बाद में ‘नोटबुक ऑफ रामानुजन’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। आज भी इसके सारे सूत्र गणितज्ञ समझ नहीं सके हैं।
गणित के कई शब्दावली रामानुज को समर्पित हैं जिससे उनके गणित में योगदान का आभाष होता है, जैसे रामानुजन संख्या (Ramanujan number- वह प्राकृतिक संख्या जो दो अलग-अलग प्रकार से दो सिद्धांतो के घनों के जोड़ द्वारा प्रदर्शित की जा सकती है।), रामानुजन अटकल (Ramanujan conjecture), आदि।
उनकी याद में 22 दिसंबर को राष्ट्रीय गणित दिवस मनाया जाता है। 2012 को राष्ट्रीय गणित वर्ष घोषित किया था। उन्हें आधुनिक काल के सबसे प्रतिभाशाली गणितज्ञों में निर्विवाद रूप से शामिल किया जाता है। गणित का एक महत्वपूर्ण जर्नल ‘रामानुज जर्नल’ का नाम उनके नाम पर ही है।
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