याचना नहीं अब रण होगा, जीवन जय या मरण होगा।
जंजीर बढ़ा अब साध मुझे, हाँ हाँ दुर्योधन बांध मुझे।
‘कुरुक्षेत्र’ में जो यह हुंकार देता है वही कलम उर्वशी में लिखता है
तब भी मरुत अनुकूल हों,
मुझको मिलें, जो शूल हों,
प्रियतम जहां भी हों, बिछे सर्वत्र पथ में फूल हों।
यह कलम थी रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की जिन्हें स्वतन्त्रता से पहले अँग्रेजी सरकार विद्रोही कवि’ कहती थी लेकिन स्वतन्त्रता के बाद राष्ट्र ने उन्हें ‘राष्ट्रकवि’ का सम्मान दिया। 23 सितंबर 1908 को
पैदा हुए राष्ट्रकवि दिनकर की राष्ट्र 116वीं जन्म दिवस मना रहा है।

दिनकर की प्रमुख रचनाएँ
दिनकर ऐतिहासिक पात्रों के लेकर वर्तमान की विसंगतियों के विरुद्ध लिखते थे। उन्होने 34 से अधिक काव्य, 26 से अधिक गद्य, 13 निबंध संग्रह लिखे। उनकी रचनाओं में प्रणभंग (1929), रेणुका (1935), हुंकार (1938), कुरुक्षेत्र (1946), यशोधरा (1946), रश्मिरथी (1952), परशुराम की प्रतीक्षा (1963), उर्वशी (1961), संस्कृति के चार अध्याय (1956) इत्यादि विशेष प्रसिद्ध हैं। इनमें से उर्वशी को छोड़ कर अन्य अधिकांश रचनाओं में वीरता, शौर्य और राष्ट्रवाद का निरूपण है।
उर्वशी कविता के रूप में लिखा गया नाटक (गीति काव्य) है। यह पृथ्वी के राजा पुरुरवा और स्वर्ग की अप्सरा उर्वशी की प्राचीन कथा को आधार बना कर लिखा गया है। पुरुरवा पृथ्वी के हैं और उन्हें स्वर्ग के सुख की कामना है जबकि उर्वशी स्वर्ग से आई है लेकिन उसे पृथ्वी के सुख की कामना है। इसमें प्रेम और सौन्दर्य के साथ मनोवैज्ञानिक विवेचन सूक्ष्म स्तर पर किया गया है। इसके लिए उन्हें 1972 में ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया था।
आजादी से कुछ ही पहले प्रकाशित कुरुक्षेत्र का आधार महाभारत का शांति पर्व है। इसमें वे बड़े ही स्पष्ट शब्दों में शक्ति का महत्त्व बताते हुए कहते हैं “क्षमा शोभती उस भुजंग को, जिसके पास गरल हो; उसको क्या जो दन्तहीन, विषहीन, विनीत, सरल हो।”
यही भाव आजादी के बाद रश्मिरथी में इन शब्दों में दुहराते हैं “पत्थर सी हों मांसपेशियाँ, लोहे सा भुज दंड अभय; नस-नस में तेज प्रवाहित हो, तभी जवानी पाती जय।” और ‘वीर’ में वे कहते हैं “वैराग्य छोड़ बाँहों की विभा संभालो, चट्टानों की छाती से दूध निकालो, है रुकी जहाँ भी धार शिलाएं तोड़ो, पीयूष चन्द्रमाओं का पकड़ निचोड़ो।”
उनका यह स्वर आजादी के बाद भी धीमा नहीं हुआ। जिस नेहरू जी ने उन्हें राज्यसभा सदस्य मनोनीत किया था उनकी गलत नीतियों का भी उन्होने विरोध किया और लिखा “देखने में देवता सदृश्य लगता है, बंद कमरे में बैठकर गलत हुक्म लिखता है। जिस पापी को गुण नहीं गोत्र प्यारा हो, समझो उसी ने हमें मारा है॥”
1962 के युद्ध में चीन से हार पर उनका मन बेचैन हो उठा। ‘हिमालय’ में उन्होने शक्ति पर ज़ोर देते हुए फिर लिखा “रे रोक युद्धिष्ठिर को न यहां जाने दे उनको स्वर्गधीर, फिरा दे हमें गांडीव गदा लौटा दे अर्जुन भीम वीर॥”
सम्मान
ओज और शौर्य से भरी युगानुकूल राष्ट्रवादी रचनाओं के कारण दिनकर को ‘युग चारण’ की संज्ञा दी गई। उन्हें भूषण के बाद का सबसे बड़ा राष्ट्र वादी कवि कहा गया। ‘संस्कृति के चार अध्याय’ के लिए उन्हें साहित्य अकादमी और ‘उर्वशी’ के लिए ज्ञानपीठ, दिया गया। ‘कुरुक्षेत्र’ को विश्व के 100 सर्वश्रेष्ठ काव्य में 74वां स्थान दिया गया है। भागलपुर विश्वविद्यालय द्वारा मानद डॉक्ट्रेट, गुरू महाविद्यालय द्वारा विद्या वाचस्पति, राजस्थान विद्यापीठ द्वारा साहित्य-चूड़ामणि इत्यादि अनेक पुरस्कार और सम्मान से वे सम्मानित हुए।
उन्हें भारत सरकार ने ‘पद्म विभूषण’ से सम्मानित किया। 1952 में प्रथम संसद में वे राज्य सभा के सदस्य मनोनीत किए गए जिस पद पर वे 12 वर्षों तक रहे। उनकी मृत्यु के बाद 1999 में भारत सरकार ने उनपर एक डाक टिकट भी जारी किया।
24 सितंबर 1908 को बिहार के बेगूसराय जिले के सिमरिया गाँव में जन्मे दिनकर जी का निधन 65 वर्ष की आयु में 24 अप्रैल 1974 को तमिलनाडू के मद्रास (वर्तमान चेन्नई) में हो गया। लेकिन उनकी मानवतावादी और राष्ट्र वादी विचार हमेशा प्रासंगिक रहेंगे:
किस भांति उठूँ इतना ऊपर?
मस्तक कैसे छू पाउँ मैं?
ग्रीवा तक हाथ न जा सकते,
उँगलियाँ न छू सकती ललाट
वामन की पूजा किस प्रकार,
पहुँचे तुम तक मानव विराट?
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