सुकरात: जिन्होने मृत्यु का भी हर्ष से स्वागत किया।

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लगभग 500 लोगों की जूरी ने एक विशेष मुकदमा पर विचार किया और अभियुक्त को ‘युवाओं को स्थापित व्यवस्था और ईश्वर में आस्था नहीं रखने के लिए उकसाने’ का दोषी माना। उन्होने उस अभियुक्त को हेमलॉक नामक एक अत्यंत घातक विष पिला कर मृत्यु दंड देने का निर्णय किया। जूरी ने उस अभियुक्त से कहा कि अगर वह चाहे तो अपनी सजा में परिवर्तन के लिए जूरी से आग्रह कर सकता है। उस समय प्रचलित नियम के अनुसार ऐसे अभियोग के लिए अगर किसी को मृत्यु दंड दिया जाता था तो वह स्वेच्छा से निर्वासन के लिए आग्रह कर सकता था। इस मुकदमे में अभियुक्त का जनता पर जो प्रभाव था वह देखते हुए लोगों का यह विश्वास था कि अगर अभियुक्त मृत्यु के बदले निर्वासन के लिए आग्रह करे तो जूरी शायद मान जाएगी। 

किन्तु यह अभियुक्त कोई सामान्य व्यक्ति नहीं था। उसका मानना था कि उसने लोगों को सत्य और ज्ञान प्राप्त करने के लिए उत्साहित किया है। सत्य और ज्ञान से राज्य और समाज को और अच्छा बनाने एवं अच्छा जीवन जीने में सहयोग मिलेगा। यह राज्य के प्रति उसकी सेवा है। इसलिए इसलिए सेवा के बदले उसे ‘आजीवन निःशुल्क भोजन’ इनाम स्वरूप मिलना चाहिए। उसके इस ‘वैकल्पिक सजा’ के आग्रह से जूरी सदस्य अचंभित हो गए। कई को लगा कि वह उनका मज़ाक उड़ा रहा है, तो कई को लगा कि वह उनकी शक्ति को चुनौती दे रहा है। अतः ‘आज सूर्यास्त से पहले मृत्यु’ का दण्ड निश्चित कर दिया गया। 

सजाप्राप्त अभियुक्त के अनुयायी दुखी और हतप्रभ थे। पर उसके चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी। उसका मस्तिष्क उसी तरह शांत और स्पष्ट था जैसे वह जीवन भर रहा था। जूरी द्वारा विचारण के दौरान भी उसने वही शांति बनाए रखी थी और अपने विचार बिना किसी हिचकिचाहट के उनके सामने रखे थे। उसे विश्वास था कि वह लोगों को ज्ञान एवं सत्य को प्राप्त करने के लिए प्रेरित करता है जो कि अपराध नहीं बल्कि ‘सेवा’ है।

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उसे सजा की प्रतीक्षा में कारागार के एक छोटे से कमरे में डाल दिया गया। कुछ विशेष अनुयायियों को उससे

अंतिम बार मिलने की अनुमति दी गई थी। अनुयायियों ने कहा कि कारागार के बहुत से रक्षक और राज्य कर्मचारी भी उसके अनुयायी थे। सब मिल कर उसे जेल से भागने में मदद करेंगे। ताकि वह कहीं दूसरे राज्य में जाकर अपने उपदेश जारी रख सके। लेकिन उसका कहना था उसने जीवन भर सत्य और ज्ञान को खोजने के लिए प्रयास किया है और लोगों को भी ऐसा ही करने के लिए कहा है। अब उसे मृत्यु के विषय में जानने का अवसर मिल रहा है तो वह इससे भागे क्यों?

सूर्यास्त का समय नजदीक आया। मृत्युदंड की सभी तैयारियां हो गई। तभी उसकी नजर उस व्यक्ति पर गई जो उसके लिए विष बना रहा था। सजाप्राप्त अभियुक्त ने उससे पूछा कि वह इतने धीरे-धीरे विष क्यों बना रहा है। उस व्यक्ति ने कहा कि वह भी अभियुक्त का प्रशंसक था और उसकी जिंदगी जितनी देर तक संभव हो बचाना चाहता है। इस पर उसने जो कहा उसने वहाँ उपस्थित सभी को दुख और आश्चर्य से भर दिया। उसने कहा उसने जीवन भर कानून का सम्मान किया है और लोगों को भी सम्मान करना सिखाया है भले ही वह कानून अनुचित ही क्यों न हो, इसलिए उस कर्मचारी को भी अपने कर्तव्य और कानून का मुस्तैदी से पालन करना चाहिए और इसमें कोई ढिलाइ नहीं बरतनी चाहिए।

जब उसे हेमलॉक विष दिया गया तो उसने उसे उसी शांत भाव से एक ही घूंट में पी लिया और कोने में पड़े एक छोटे से बिस्तर पर जाकर ऐसे लेट गया जैसे सोने की तैयारी कर रहा हो। विष शरीर पर अपना प्रभाव दिखाने लगा। लेकिन उसका मस्तिष्क अभी भी शांत और स्पष्ट था। वह अभी भी अपने अनुयायियों से अपनी बात कह रहा था। उसकी साँसे और आवाज धीरे होती गईं और फिर रुक गईं।

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मृत्यु को इतने गरिमा से अपनाने वाला व्यक्ति था सुकरात (Socrates)। उसका जीवन काल था 470-399 ईसा पूर्व। यह प्राचीन यूनान के नगर राज्य एथेंस का एक दार्शनिक था। लेकिन उसके उपदेश देने की शैली पहले के विचारक और दर्शनिकों से सर्वथा भिन्न थी। वह लोगों के उपदेश नहीं देता था बल्कि लोगों से प्रश्न पूछता था। उसके प्रश्न दिखने में तो सरल लगते थे लेकिन गहन विचार की अपेक्षा रखते थे। जैसे ‘जीवन क्या है?’ ‘जीने का सही तरीका क्या है?’ आदि। जब एक प्रश्न का उत्तर मिलता तो दूसरा, फिर तीसरा प्रश्न करता। उसका हर प्रश्न पिछले से अधिक गहन होता था। इसी तरह प्रश्नों के सिलसिले से लोग सोचने के लिए विवश हो जाते थे। सुकरात का मानना था वह लोगों को उपदेश नहीं देना चाहता बल्कि उन्हे विचार करने के लिए और सत्य को खोजने के लिए प्रेरित करना चाहता है।

सरल प्रश्नोत्तर शैली से गहन विचार करने के उसके तरीके ने शीघ्र ही लोगों को ध्यान खींचा। बहुत से लोग उसके अनुयायी और शिष्य बन गए। युवा उसकी बातों पर विचार करने लगे। यह सब राजशक्ति को अपने विरुद्ध लगने लगा। अंततः ‘युवाओं को उकसाने के अपराध’ में उसे मृत्युदंड दे दी गई। पर उसकी मृत्यु के बाद भी उसके विचार और शैली जीवित रहें। उसके शिष्यों में से कई आगे चल कर स्वयं प्रसिद्ध दार्शनिक और विचारक बने। इन शिष्यों में प्लेटो सबसे प्रसिद्ध था।

इन शिष्यों के माध्यम से सुकरात के विचार और प्रश्नोत्तर शैली यूरोपीय देशों में पहुंची। आज भी न्यायालयों ने गवाहों से प्रश्न कर ही सत्य तक पहुँचने की कोशिश की जाती है। वर्तमान लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था का मूल है जन प्रतिनिधियों के बीच बहस और प्रश्नोत्तर। इनकी जड़ें सुदूर अतीत में सुकरात तक खोजी जा सकती हैं।        

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