शब्द के पाँव

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बात बहुत पुरानी है। एक गाँव में एक किसान रहता था। वह बहुत ईर्ष्यालु और क्रोधी था। वह जब किसी व्यक्ति को अपने से खुश देखता था तो उसे अच्छा नहीं लगता था। गुस्सा भी बहुत जल्दी आ जाता था। गुस्से में उसे अपने जुबान पर कोई नियंत्रण नहीं रहता था। वह कुछ भी बोलता था बिना सोचे-समझे।

एक दिन खेत से लौटते समय किसी बात पर उसे अपने एक पड़ोसी पर गुस्सा आ गया। उसने स्वभाव के अनुसार अपने पड़ोसी को और उसके विषय में दूसरे पड़ोसियों को बहुत कुछ कठोर बाते बोला। गुस्से में उसे यह भी याद नहीं रहा कि उसका पड़ोसी कितना भला आदमी था और जरूरत पड़ने पर कभी उसकी कितनी मदद की थी।

बहुत कुछ बोलने के बाद जब वह घर गया और उसका गुस्सा थोड़ा शांत हुआ तब पत्नी से पता चला कि पड़ोसी की कोई गलती नहीं थी। उसे अब अपनी बातों पर बड़ा पश्चाताप हुआ। उसे अपने पर ग्लानि होने लगी। उसका मन अशांत था। किसी ने सलाह दिया कि पास में एक पहुंचे हुए संत आए थे, उनसे मिलकर कोई उपाय पूछे जिससे उसका पश्चाताप कम हो सके।

किसान संत के पास पहुंचा और अपने मन की सारी बातें सुना दिया। संत से सब सुनने के बाद उस किसान से एक पत्ता मंगवाया। उसने पत्ते के छोटे-छोटे टुकड़े कर दिया और किसान से उसे चौराहे पर फेंक देने के लिए कहा। किसान ने वैसा ही किया। संत से अब उससे अगले दिन आने के लिए कह कर विदा कर दिया।

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अगले दिन जब किसान संत के पास अपनी समस्या के समाधान के लिए पहुंचा तो संत ने कहा कि वह समाधान देगा लेकिन पहले वह कल वाले पत्ते को ले आए। किसान जब चौराहे पर गया तब वहाँ पत्ते का नमोनिशान नहीं था। पत्ते के सारे टुकड़े हवा में बिखर गए थे। वह संत के पास खाली हाथ लौट आया।

संत ने प्रेम से समझाते हुए उसे कहा “हमारे मुँह से निकले हुए शब्द ऐसे ही होते हैं। एक बार मुँह से निकलने के बाद चाहे हम कितना भी क्यों न पछताए लेकिन उसे वापस नहीं ले सकते हैं। इसलिए क्रोध में कटु वचन बोलते समय, या झूठ बोलते समय शब्दों का चयन बहुत सावधानी से करें। मुँह से निकलने के बाद शब्द हमारे नहीं रह जाते हैं।”   

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