संसाधनों का उपयोग

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भगवान बुद्ध आवश्यकता से अधिक लेने को सन्यासियों के लिए चोरी समझते थे। अपरिग्रह बौद्ध धर्म का एक प्रमुख सिद्धान्त है। एक बार उनके एक शिष्य ने उनसे नए वस्त्र की मांग की क्योंकि उसके पुराने वस्त्र बिलकुल जर्जर हो चुके थे। किसी अनुयाई से कह कर बुद्ध ने उनके लिए वस्त्र का इंतजाम कर दिया। कुछ दिनों बाद बुद्ध को वह शिष्य मिला तो उन्होने उससे वस्त्र के लिए पूछ लिया। शिष्य ने विनम्रतापूर्वक बताया कि उसे नए वस्त्र मिल गए थे और अब उसे कुछ और नहीं चाहिए था।

       बुद्ध ने जिज्ञासा वश पूछ लिया ‘नए वस्त्र मिलने के बाद तुमने पुराने वस्त्रों का क्या किया?’ शिष्य ने उत्तर दिया कि वह अब उनका उपयोग ओढ़ने के लिए कर रहा था। बुद्ध के और प्रश्न करने पर उसने कहा कि पुराने ओढ़ने को उसने अब पर्दे की जगह लगा दिया और पुराने पर्दे को टुकड़ा कर उसे रसोई में गर्म बर्तन उतारने के लिए उपयोग में ले आया। पुराने रसोई के कपड़े को उसे पोछा बना लिया। बुद्ध ने पुनः पुराने पोछे के कपड़े लिए पूछा। शिष्य ने कहा “प्रभु वो अब इतना तार-तार हो चुका था कि उसका कुछ नहीं किया जा सकता था, इसलिए मैंने उसका एक-एक धागा अलग कर दिए की बातियाँ तैयार कर लीं ….उन्ही में से एक कल रात आपके कक्ष में प्रकाशित था।”

अब बुद्ध संतुष्ट थे कि उनका शिष्य संसाधनों का सही उपयोग करना जान गया था। जीर्ण वस्त्र का उपयोग प्रकाश फैलाने के लिए किया जा सकता है तो फिर मानव के जीर्ण काया से क्या नहीं हो सकता।