विल्मा रूडोल्फ

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1960 में रूस (तब सोवियत संघ) में ओलंपिक खेलों का आयोजन हुआ था। एक अश्वेत अमरीकी महिला धाविका ने तीन गोल्ड मेडल जीता। वह 100 मीटर, 200 मीटर और 300 मीटर की रीले दौड़ जीत कर दुनिया की सबसे तेज धविका बनी। यह उपलब्धि हासिल करने वाली वह अमेरिका की पहली महिला थी। इससे पहले 1956 में मेलबोर्न (ऑस्ट्रेलिया) में हुए ओलंपिक में वह 400 मीटर दौड़ में ब्रांज मेडल जीत चुकी थी। इस महिला का नाम था विल्मा रूडोल्फ।

       विल्मा आम शारीरिक क्षमता की खिलाड़ी नहीं थी। वह पोलियो को हराने के बाद यह जीत हासिल की थी। 1940 में अमेरिका के एक गरीब अश्वेत परिवार में जन्म लेने वाली विल्मा अपने कुली पिता की दो पत्नियों से हुए कुल 22 भाई-बहनों में 20वें नंबर पर थी। सामाजिक और आर्थिक दोनों रूपों से वंचित परिवार से होने के कारण यूं ही उसका जीवन संघर्षों से भरा था। उस पर उसे बचपन में ही पोलियो हो गया। बहुत इलाज के बाद भी वह केलिपर्स के सहारे ही चल पाती थी। अपने भाई-बहनों को खेलते देख उसका मन भी खेलने के लिए मचलता था। इलाज के लिए भी पैसे नहीं थे। लेकिन न तो विल्मा ने न ही उसकी माँ ने हिम्मत हारी। धीरे-धीरे उसके पैरों में ताकत आने लगी। 12 वर्ष की उम्र में उसने ब्रेसेस के सहारे चलना शुरू किया और 13 वर्ष की उम्र में भाई-बहनों के साथ खेलने लगी। वह स्कूल भी जाने लगी।

       लेकिन विल्मा के सपने केवल भाई-बहनों के साथ खेलने तक ही नहीं रुकी। उसे दौड़ने में आनंद आता था। वह दौड़ना चाहती थी। वह दुनिया की सबसे तेज दौड़ने वाली इंसान बनना चाहती थी। अथक प्रयासों के बाद वह दौड़ने भी लगी। वह स्कूल के खेलकूद प्रतियोगिता में भाग लेने लगी। पहली प्रतियोगिता में अंतिम स्थान पर रही। इसके बाद भी वह हारती रही। लेकिन उसने दौड़ना नहीं छोड़ा।

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       जब ग्रेजुएशन के लिए उसने टेनेसी यूनिवर्सिटी में एडमिशन लिया तो वहाँ उसकी मुलाक़ात एक कोच से हुई जिनका नाम था एड टेम्पल। कोच ने विल्मा के जज्बे को देख कर उसके सपनों को साकार करने में उसका साथ देना शुरू किया। वह इतनी मेहनत से अपनी ट्रेनिंग करती थी कि उसने एक दिन के लिए भी ट्रेनिंग से अवकाश नहीं लिया। विल्मा की मेहनत और उसके कोच एवं उसकी माँ का उसमें विश्वास, से एक दिन वह भी आ गया जब उसने इतिहास बना डाला।  

       1994 में विल्मा का निधन हो गया। लेकिन एक सुविधाहीन पोलियोग्रस्त लड़की से दुनिया की सबसे तेज धविका बन कर वह आने वाली पीढ़ियों को आज भी प्रेरित कर रही है।

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