बाज की उड़ान

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एक राजा को एक बार किसी ने उपहार में बाज के दो बच्चे दिए। बाज के दोनों ही बच्चे बड़े ही शानदार लग रहे थे। राजा उन्हे देख कर बहुत खुश हुआ। उसने अपने एक विश्वासपात्र सेवक को बुला कर उन दोनों को सौंपते हुए उससे उनकी अच्छी परवरिश करने के लिए कहा।

       कुछ दिनों बाद राजा बाज के उन दोनों बच्चों को देखने गया। दोनों ही अब बड़े हो गए थे और बहुत ही शानदार लग रहे थे। राजा ने उनकी उड़ान देखने की इच्छा प्रकट किया। लेकिन यह क्या! एक बाज तो आकाश में ऊँची-ऊँची उड़ान भरने लगा लेकिन दूसरा थोड़ी दूर उड़ कर पास के ही एक पेड़ की डाल पर जा बैठा। उसे ऊँचे उड़ाने की सभी कोशिशें बेकार रहीं। हर बार वह थोड़ा-सा उड़ कर उसी डाल पर जा बैठता। राजा उसे भी उसके भाई की तरह ऊँचा उड़ता देखना चाहता था। जब सभी प्रयास निष्फल रहे तो राजा ने उस बाज को ऊँचा उड़ाने वाले व्यक्ति के लिए ईनाम की घोषणा कर इसकी मुनादी समस्त राज्य में करवा दिया।

       राज्य भर से कई लोग आए, पर कामयाब नहीं हो सकें। एक दिन एक किसान आया। उसने उस पेड़ को काट देने के लिए कहा जिस पर वह  बाज जाकर बैठ जाता था। यह तरकीब काम कर गयी। अब दूसरा बाज भी उड़ने लगा। राजा के आश्चर्य की सीमा नहीं रही। उसने किसान से इसका कारण पूछा। किसान ने कहा “कारण बिलकुल सरल है। उस बाज को शुरू से ही उस डाल पर बैठने की आदत हो गयी थी। इस कारण उसने कभी उड़ने का प्रयास ही नहीं किया। जब डाल नहीं रहा तो मजबूरी में उसे अपनी क्षमता का प्रयोग कर उड़ना पड़ा।”

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       कई बार ऐसा हमारे साथ भी होता है। सारी जिंदगी हम जिस तरह जीवन जीने के आदि हो जाते हैं, उसे छोड़ कर आगे नहीं बढ़ पाते हैं। इसलिए अपनी क्षमताओं का उचित प्रयोग नहीं कर पाते। कई बुजुर्ग लोग सोचते हैं, अब इस उम्र में उनसे क्या हो पाएगा। लेकिन नया करने के लिए, नया सोचने के लिए और अपनी क्षमता पहचानने के लिए कभी भी देर नहीं होती है। बस जरूरत होती है अपनी आदतों और सुविधाओं के घेरे से बाहर निकलने की।

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