पड़ोसी की आग-हमारी आतिशबाज़ी

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हमारा एक और, या यूं कहें हमारा एकलौता बचा अंतिम पड़ोसी देश भी अराजकता की भेंट चढ़ गया। लेकिन कुछ लोग मंत्रियों के दुर्दशा की, उनके जलते घरों की, और जलते संसद भवन की फोटो सोशल मीडिया पर मजे ले लेकर शेयर कर रहे हैं। किसी को ‘हिन्दू राष्ट्र’ दिखता है, किसी को ‘हिन्दू राष्ट्र’ नहीं रहने का परिणाम। कोई अपने भ्रष्ट्र मंत्रियों के इस हाल की कामना कर रहा है तो कोई ‘विरोधी’ और ‘विदेशी’ ताकतों का षड्यंत्र ढूंढ रहा है।  

वास्तव में सरकार द्वारा जितना गलत इस आंदोलन को ‘सोशल मीडिया बैन’ का विरोध मानना था, उतना ही गलत इसे मीडिया द्वारा ‘जेन जे’ आंदोलन या भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन कहना है। कारण एक नहीं अनेक हैं। ईंधन बहुत दिनों से इकट्ठा हो रहा था।  

युवा या आम जनता का आंदोलन कहने, देखने, सुनने में तो अच्छा लगता है भले ही उसके पीछे कितना ही उचित कारण क्यों न हो। लेकिन इसके बाद केवल अराजकता, हिंसा और अव्यवस्था ही आती है। भले ही वह फ्रांस क्रांति हो, या हाल के वर्षों में हुए दुनिया भर के आंदोलन। कुछ लोगों के बदले पूरे देश को सजा मिल जाती है जिसके भरपाई बरसों में नहीं होती।

हमारे देश ने भी कई ऐसे मोड़ देखे हैं। कल्पना कीजिए इन्दिरा गांधी के आपातकाल या नसबंदी से जनता में कितना गुस्सा था। लेकिन क्या होता अगर इसके बदले देश की जनता देश में ऐसी  अराजकता ले आती जैसी आज नेपाल और बांग्लादेश में है। लेकिन हमने देश को बचाते हुए सरकार को हटाया था।

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आज सोशल मीडिया में दौर में कोई भी कहीं भी सुरक्षित नहीं है। फेक नरेटिव पर किसी एक सरकार, पार्टी या देश का हक नहीं है, हर तरफ से किया जा रहा है। जिन-जिन कारणों से हमारे पड़ोसी देश जल रहे हैं, वे सारे ईंधन हमारे देश में भी हैं। सरकार विरोध के नाम पर अराजकता और हिंसा को बढ़ावा नहीं दिया जा सकता है। आज पड़ोस जल रहा है कल हम भी इस आंच में हो सकते हैं। आज नेपाल की पहचान एक सुंदर पहाड़ी देश, बहादुर गोरखाओं का देश, हमेशा गर्व से स्वतंत्र रहे देश की नहीं बल्कि एक टूटे हुए, अशांत देश के रूप में है। आग भले ही बुझ जाए लेकिन निशान जाने में दशकों लग जाएंगे। हम अपने घर को बचाएं, ये सरकार ही नहीं जनता की भी ज़िम्मेदारी है।