अघोरी आदि वाममार्गी पंथ भगवान शिव की ही पूजा क्यों करते हैं?

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जब हम ऋषि-मुनि, साधू-संतो की बात करते हैं तो हमारे दिमाग में एक शांत मस्तिष्क के पवित्र जीवन जीने वाले व्यक्ति की छवि आती है जो धर्म के विषय में जानकारी रखता हो। लेकिन यहाँ धुआँ उड़ाते, हाथों में शस्त्र लिए साधू भी मिल जाते हैं। आम लोग सम्मान से ज्यादा उत्सुकता के कारण इन्हें देखना और उनके बारे में जानना चाहते हैं। तो कौन हैं ये? क्या करते हैं ये? दोनों इतने विपरीत स्वरूपों में से हिन्दू धर्म का वास्तविक स्वरूप कौन सा है? ये ज़्यादातर शिव के ही भक्त क्यों होते हैं? अजीब से भेषभूषा और नशा से क्या संबंध है इनका? साधू-संतों के तो आश्रम या मठ होते हैं, फिर इनके अखाड़ा क्यों हैं? इत्यादि अनेक प्रश्न उठते हैं।

इस संबंध में आगे बात करने से पहले हिन्दू धर्म के कुछ बेसिक कान्सैप्ट को समझना जरूरी है।

भगवान शिव का प्रेतों से संबंध

भगवान शिव निराकार ब्रह्म के साकार रूप हैं। उनका जन्म नहीं हुआ है इसलिए वे मृत्यु से भी परे हैं। इतना ही नहीं वे सभी इच्छाओं और कामनाओं से भी परे हैं, मुक्त हैं। इसीलिए वे कामदेव को मारने वाले हैं। भगवान विष्णु की तरह उन्हें न तो 56 भोग लगाया जाता है, न ही सुंदर-सुंदर गहने और कपड़ो से उन्हें सजाया जाता है। हालांकि भगवान विष्णु की भी अपनी कोई इच्छा नहीं है। पर वे अपने भक्तों की इच्छाओं को अपना लेते हैं। लेकिन शिव के साथ ऐसा नहीं है। वे पूर्णत: विरक्त होते हैं। उन्हें कुछ नहीं चाहिए।

इस तरह शिव के पास शरीर है लेकिन कामनाएँ नहीं, विरक्ति है। दूसरी तरह प्रेत होते हैं जिनके पास शरीर नहीं होता है लेकिन कामनाएँ होती हैं, आसक्ति होती है। आप लोगों में से अगर किसी ने कभी किसी का अंतिम संस्कार किया होगा तो पता होगा कि पिंडदान द्वारा प्रेत को पितर बनाने की क्रिया की जाती है और कोशिश की जाती है कि उसकी सांसारिक आसक्ति और इच्छाएँ खत्म हो सके।

इन दोनों अतिवाद के बीच संतुलन बनाने का कार्य करती हैं शक्ति यानि शिव की पत्नी पार्वती। कहानियाँ बताती हैं कि शक्ति यानि पार्वती की प्रेरणा से ही शिव कैलाश छोड़ कर काशी आए थे। यहाँ पार्वती अन्नपूर्णा के रूप में प्रतिष्ठित हुईं और शिव विश्वनाथ के रूप में। अगर आप काशी गए होंगे तो वहाँ अन्नपूर्णा से भिक्षा मांगते योगी रूप में शिव की मूर्ति या फोटो जरूर देखा होगा आपने।         

यहाँ आकर शक्ति की प्रेरणा से विरक्त शिव अपने भक्तों के लिए थोड़े आसक्त हो जाते हैं। स्वयं जन्म-मृत्यु से परे शिव यहाँ मरने वालों को मोक्ष देते हैं और अपने गणों के लिए अन्नपूर्णा से भिक्षा मांगते हैं। लेकिन उनका यह सारा कार्य लोगों के कल्याण के लिए होता है, अपने लिए नहीं।    

शिव का मृत्यु का संबंध

शिव के लिए जीवन और मृत्यु में कोई अंतर नहीं है। स्वयं तो वे मृत्युंजय हैं ही लेकिन दूसरे मर्त्य प्राणियों को भी मोक्ष देते हैं। वे विरक्त हैं, उनके लिए सभी एक बराबर हैं, इसलिए शमशान में रहने वाले चांडाल आदि लोगों के लिए भी उनका आश्रय हमेशा खुला हुआ है।

शिव का विष से संबंध

सृष्टि के कल्याण के लिए ही उन्होने समुद्र मंथन से उत्पन्न कालकूट विष पिया। कथा है कि इस विष को बर्दाश्त करने की क्षमता शिव को छोड़ कर और किसी में नहीं थी। शिव ने भी उसे बर्दाश्त तो कर लिया लेकिन इससे उन्हे थोड़ा कष्ट जरूर हुआ। कुछ जीव जंतुओं और पेड़-पौधों ने उनसे विष का कुछ भाग ले लिया ताकि उन्हें थोड़ा आराम मिल सके। शिव के विष में तो इससे कोई विशेष फर्क नहीं पड़ा लेकिन अपने प्रति उनकी यह भक्ति देख कर शिव प्रसन्न हुए और हमेशा उन्हें अपने पास रखने का वचन दिया। इसीलिए सांप, बिच्छू जैसे विषैले जीव, और भांग, आंक, धतूरा एवं बेल जैसे विषैले पौधे उनके प्रिय हो गए। लेकिन नशा से उनका कोई संबंध नहीं है। नशा पाँच महापापों में गिना जाता है।

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शिव का पशुओं से संबंध

प्राचीन काल से ही शिव की पशुपति रूप की पूजा होती थी। हालांकि पशुओं के स्वामी वैदिक काल में विष्णु को माना गया था, गोपाल भी वही थे, लेकिन शिव पालतू पशुओं के नहीं, बल्कि वनीय पशुओं के देवता थे, उनके रक्षक थे।  इस तरह धीरे-धीरे हाशिये पर रहे लोग भूत-प्रेत, चांडाल, विरक्त योगी, विषैले और जंगली जीव-जन्तु इत्यादि उनसे एसोसिएटेड होते गए।

शव, नशा, नग्नता इत्यादि कब और कैसे उनकी साधना से जुड़ते गए?

शिव का शाब्दिक अर्थ होता है ‘कल्याण करने वाला’। वे एक शांत एवं विरक्त सन्यासी हैं। तो फिर अघोरी, तांत्रिक, योगी, नागा इत्यादि विभिन्न वाममार्गी साधू शिव के उपासक कैसे होते हैं? कौन होते हैं ये साधू? वे ऐसे सभी कार्य क्यों करते हैं जिन्हें हिन्दू धर्म में पाप माना जाता है? आज के आलेख में इसे समझने का प्रयास करते हैं।

शिव: एक साधक या संहारक?

मूलतः शिव एक ऐसे विरक्त सन्यासी हैं जिन्हें अपने लिए कुछ नहीं चाहिए लेकिन दूसरे के कल्याण के लिए वे हमेशा तैयार रहते हैं। समुद्र मंथन से 14 रत्न निकले उसमें से उन्होने कुछ नहीं लिया लेकिन कालकूट विष को अपने गले में धारण कर लिया ताकि सृष्टि का विनाश नहीं हो। वे आशुतोष हैं यानि बहुत जल्दी प्रसन्न हो जाते हैं।

हालांकि वेदों में भगवान शिव का उल्लेख रुद्र नाम से हुआ है। रुद्र नाम उनके भयंकर आवाज के कारण उनको दिया गया था और यह उनका रौद्र रूप माना जाता था। लेकिन सती की मृत्यु को छोड़ कर उनके अत्यधिक क्रोधित होने का कोई अन्य उल्लेख नहीं है। इन्होने कुछ राक्षस मारे थे, लेकिन उनसे अधिक राक्षस तो भगवान विष्णु ने मारे थे। फिर नरसिंह के रूप में उन्होने भी तो भयंकर अवतार लिया था। अगर वे तांडव करते थे तो वे नटराज यानि कलात्मक नृत्य के देवता भी थे।

भगवान शिव किसका संहार करते हैं?  

ब्रह्मा, विष्णु और महेश की त्रिमूर्ति में ब्रह्मा को सृष्टि का कर्ता, विष्णु को पोषक और शिव को संहारक कहा गया। बहुत से लोग मानते हैं कि शिव तांडव करते हैं और तब प्रलय होता है, इसलिए वे विनाशक हैं। लेकिन ऐसी बात नहीं है। संहारक का अर्थ पाप, कर्मफल, और भय के संहारक के रूप में लिया गया है। 

शिव: हाशिये के और ठुकराए गए प्राणियों के भगवान

विभिन्न कारणों से भगवान वनीय पशु, विषैले जीव जन्तु और वनस्पति, समाज के हाशिये पर रहने वाले समुदाय जैसे चांडाल, भूत-प्रेत इत्यादि से किसी-न-किसी रूप में एसोसिएट थे। इसके विषय में पिछले आलेख में अधिक विस्तार से बताया गया है। सीधे शब्दों में कहें जो जिसे कहीं शरण नहीं मिलता था वह भी शिव का शरण पा सकता था। इसी कारण उन्हें ‘अशरण शरण’ और ‘आशुतोष’ कहा गया है।

शिव के भयंकर रूप की पूजा

पशुपति और रुद्र के रूप में शिव की चर्चा वेदों में और संभवतः उससे पहले भी मिलती है। फिर भी पाँचवी शताब्दी तक उनकी पूजा सामान्यतः उनके सौम्य रूप में ही होती थी। मूर्तियों और चित्र में शिव को हमेशा शिवलिंग के रूप में, एक शांत योगी के रूप में समाधि में, या पार्वती के साथ कैलाश पर शांत बैठे रूप में ही दिखाया जाता था।

लेकिन छठी-सातवीं शताब्दी से कुछ ऐसे शैव समुदायों का उल्लेख मिलने लगता है जो अपने को शिव का आराधक कहते थे लेकिन उनकी पद्धति प्रचलित पूजा विधि के बिलकुल विपरीत थी। यहाँ तक कि ये उन चीजों को अपने धार्मिक क्रियाओं में मुख्य स्थान देते थे जो साधारणत: हिन्दू धर्म में वर्जित थी। इन्होने शिव के भयंकर रूप को अधिक प्रचलित किया।

तांत्रिक, अघोरी, नागा एवं योगी आदि मतों का आरंभ

ऐसे समुदायों में सबसे प्रसिद्ध थे निलपट, कालामुख और कापालिक। कालामुख, कापालिक आदि संप्रदाय भी बाद में विचारधार और अपने धार्मिक अनुष्ठानों के आधार पर बंट गए और थोड़े-बहुत परिवर्तित भी हो गए। यही समुदाय आगे चल कर तांत्रिक कहलाया। इसमें कुछ अधिक अतिवादी समुदाय अघोड़ी कहलाया। नागा साधू अपनी वेश भूषा के कारण लोगों की उत्सुकता के केंद्र बन गए। लेकिन साधारण लोगों ने इन सबसे अधिक सम्मान योगियों को दिया। जिनमें 84 योगी विशेष प्रसिद्ध हुए। इनमें सबसे प्रसिद्ध थे मच्छेन्द्र नाथ, गोरखनाथ आदि। यूपी के वर्तमान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इसी संप्रदाय से हैं और गोरखनाथ मठ के महंत रह चुके हैं।

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हालांकि इन सभी में वर्तमान में आपस में मौलिक अंतर है। लेकिन फिर भी कमोवेश ये जिन सिद्धांतों को मानते हैं, उनमें कई ऐसे होते हैं जिन्हें मुख्य धारा के हिन्दू धर्म में अधर्म या पाप माना जाता है। इनमें योगी सबसे अधिक मुख्य धारा के करीब हैं फिर भी वे पूर्णत: शैव भक्तों के जैसे नहीं होते हैं। उदाहरण के लिए वे तिलक नहीं लगाते जैसा कि त्रिपुंड तिलक शिव के भक्त लगाते हैं। इसलिए मोटे तौर पर इन अतिवादी पंथों को मॉडर्न टर्मिनोलोजी में वाममार्गी पंथ या संत कह दिया जाता है। हालांकि ये संतों के किसी भी परंपरागत परिभाषा में नहीं आते हैं।

हम इनमें से कुछ प्रमुख अतिमार्गी या वाममार्गी पंथों पर विस्तार से बात करेंगे पर उससे पहले देखते हैं कि सामान्य यानि कि मुख्य धारा के हिन्दू धर्म से ये किस तरह अलग होते हैं।

हिन्दू और वाममार्गी पंथों में मौलिक अंतर      

पंच मकार

जैसे सिक्ख लोग ‘पंच ककार’- केश, कड़ा, कच्छा, कृपाण और कंघा’ को अपने धर्म का मूल भाग मानते हैं वैसे ही ये लोग ‘पंच मकार’ को अपने धर्म का मूल मानते थे। ये थे- मद्य, मांस, मत्स्य, मुद्रा और मैथुन।’ कुछ हद तक मुद्रा को छोड़ कर अन्य चारों चीजें ऐसी थीं जिन्हें मुख्य धारा के धर्म में धर्म विरुद्ध माना जाता था और कम से कम किसी संत, साधू या संन्यासी से इसकी उम्मीद नहीं की जाती थी। मुद्रा का अर्थ होता है योग की विभिन्न विधियाँ और शारीरिक मुद्राएँ जिससे वे मानते थे कि उन्हें विशेष शारीरिक और आध्यात्मिक शक्तियाँ मिलती हैं।

मृत्यु

इन पंच मकार यानि ‘म’ से शुरू होने वाले शब्दों के अतिरिक्त इनमें एक और ‘म’ को जोड़ा जा सकता है। वह है मृत्यु। मुख्य धारा के धर्म में मृत्यु को अपवित्र माना जाने लगा था। यहाँ तक कि आरंभ में जिन समुदायों को अपवित्र या अछूत माना गया था वे सभी मृत्यु से ही जुड़े हुए थे। वास्तव में भारत में ‘अछूत’ का कान्सैप्ट मृत्यु से ही जुड़ा था। पहले वर्ण थे लेकिन किसी वर्ण को अछूत नहीं कहा गया था, शूद्र को भी नहीं। विदुर शूद्र थे लेकिन अछूत नहीं। चांडाल, डोंब और पारशव पहले ऐसे तीन समुदाय थे जिन्हें ‘अछूत’ कहा गया, ये सभी मृत्यु से जुड़े हुए थे। बाद की शताब्दियों में अछूत का यह विचार और गहरा हुआ। आज भी अगर कोई मृतक संस्कार कर शमशान से लौटता है तो उसे बिना नहाए घर में प्रवेश नहीं दिया जाता है। हो सकता है यह पहले संक्रमण रोकने के लिए हो, या मृत्यु के डर की वजह से हो, लेकिन सामाजिक दृष्टि से इसके बहुत दुष्परिणाम भी हुए।

लेकिन कापालिक, कालामुख जैसे समुदाय मृत्यु को लेकर बड़े फ़ैसिनेट थे। वे मृत्यु से जुड़े चीजों को पवित्र मानते थे। शमशान, शवों के भस्म, इन्सानों के कंकाल, नरमुंड आदि उनके लिए पवित्र थे और उनके धार्मिक अनुष्ठानों में इनका प्रयोग होता था।

सामाजिक समरसता

ये वाममार्गी पंथ सामाजिक भेदभाव को नहीं मानते थे।

स्त्री को महत्व

स्त्री देवी को महत्त्व, स्त्रियों के मासिक चक्र को पवित्र मानना आदि भी ऐसे ही विचार थे।

भगवान के रौद्र रूप की आराधना

इसी तरह भगवान के क्रुद्ध रूप की कभी भी पूजा नहीं की जाती है लेकिन ये लोग करते थे।

काम, क्रोध, लोभ आदि से दूरी

ऋषि-मुनियों के लिए क्रोध से रहित होना जरूरी होता था। विश्वामित्र को तब तक ब्रहमर्षि नहीं माना गया जब तक कि उनमें क्रोध रहा। जब वे राजा दशरथ से राम को मांगने आते हैं तो कहते हैं कि राक्षसों का संहार तो मैं स्वयं भी कर सकता हूँ लेकिन मैंने जो अनुष्ठान शुरू किया हुआ है उसमें क्रोध करना मना है। दुर्वासा जैसे कुछ उदाहरणों को छोड़ दें तो साधारणतः क्रोध ऋषियों के लिए उचित नहीं था। इसी तरह धर्म विहित काम संबंध और जीविकोपार्जन की उनसे अपेक्षा की जाती थी। अगर भिक्षा या दान से जीवन चलता हो तो उतना ही मांगना चाहिए थे जितना जीने के लिए जरूरी हो। लेकिन वाममार्गी संत इन सबमें रेलेक्स होते हैं।

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नग्नता

हिन्दू धर्म में यहाँ तक कि स्नान के समय भी निर्वस्त्र होना अधर्म माना गया है। अगर बालक सन्यासी है तो लंगोट, अगर बड़ा है तो जहां तक तो सके मृगचर्म या किसी तरह का कोई न कोई वस्त्र पहनते ही थे ऋषि-मुनि लोग। लेकिन नागा सन्यासी तो हमेशा निर्वस्त्र रहते हैं।

नशा

चूंकि ये वो लोग थे जो किसी भी सामाजिक और धार्मिक नियमों को नहीं मानते थे। ये सामाजिक और  पारिवारिक बंधनों को छोड़ चुके थे। ये अपनी ही बेमकसद जिंदगी में मस्त रहते थे। पर इनकी ये मस्ती भजन-कीर्तन से होने वाली सात्विक मस्ती नहीं बल्कि नशा और बेपरवाह जिंदगी से मिलने वाली मस्ती थी। मुख्य धारा में नशा को महापाप माना जाता था। पर ये लोग मद्य ही नहीं बल्कि किसी भी तरह के नशा के प्रयोग करने से बाज नहीं आते थे। मद्य यानि शराब के अतिरिक्त भांग, गाजा और चिलम आदि भी प्रयोग करते थे जिनका भगवान शिव से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है। आम लोग अपने शरीर को सजाते संवारते हैं लेकिन ये अपना रूप भयंकर और अनोखा बनाते थे और अपने को शिव के भूत-प्रेत की तरह देखते थे।

इसी तरह अपने को आघात पहुंचाना, दंड यान डंडा के अलावा कोई अन्य भौतिक हथियार रखना, स्नान नहीं करना इत्यादि अनेक ऐसी बातें हैं जो मुख्य धारा में धर्म विरुद्ध माना जाता था। ऋषि-मुनि के आश्रम में कभी जीव हत्या नहीं होती थी। यजमान यज्ञ करते थे जिसमें जरूर जीव हत्या होता था। लेकिन ब्राह्मण या ऋषि-मुनियों द्वारा बलि नहीं दिया जाता था। अथर्व वेद में जादू-टोना का जिक्र है लेकिन इसे पाप बताया गया है। मौर्य काल में जादू टोना करना अपराध घोषित कर दिया गया था और इसके लिए राजकीय दंड भी दिया जाता था। लेकिन तांत्रिक या अन्य वाममार्गी पंथों ने इसे अपनाया था। 

आम शिव भक्त त्रिपुंड तिलक यानि तीन क्षैतिज (horizontal) रेखा वाला तिलक लगाते हैं। नियमित स्नान और शरीर की सफाई का ध्यान रखते थे। शुद्ध-अशुद्ध एवं भक्ष्य-अभक्ष्य का विचार करते थे। उनके लिए पूजा का समय सुबह और शाम होता था। किन्तु वाममार्गी इनमें से कुछ नहीं करते। इनके लिए पूजा का सबसे उपयुक्त समय आधी रात का होता है जिसे ये लोग निशा पूजा कहते हैं। साधू-सन्यासियों को क्रोध और हिंसा से दूर रहना चाहिए ऐसे विचार उन्हें पसंद नहीं है। वे हथियार भी रखते हैं।  

इतिहासकारों के विचार

मूल धर्म के बिलकुल उल्टा सिद्धान्त अपनाने के कारण इतिहासकार रोमिला थापर मानती है कि ये प्रचलित धर्म के विरुद्ध एक तरह का विद्रोह था। इन पर बौद्ध धर्म की बज्रयान शाखा, जो कि तांत्रिक मत का ही एक रूप है, और शाक्त मत का भी प्रभाव माना जाता है।

मुख्य धारा हिन्दू धर्म और वाममार्गी पंथ

यहाँ दो बाते बड़ी महत्वपूर्ण हैं। पहला, ये लोग ऐसे सारे काम करते थे जो कि मुख्य धारा के विपरीत था। पर, हमारी संस्कृति इतनी सक्षम है कि विरोध को समेट कर एक कर देती है। इसलिए कभी भी इन लोगों का मुख्य धारा के शिव भक्तों से कोई टकराव नहीं हुआ। बल्कि कठिन साधना और आध्यात्मिक शक्तियों के कारण उन्हें सम्मान दिया गया और शिव के रौद्र रूप के उपासक के रूप में मुख्य धारा ने उन्हें सहज ही स्वीकार कर लिया।

दूसरा यह कि, ये लोग भले ही अलग और रहस्यवादी क्रियाएँ करते थे लेकिन योग, आयुर्वेद और धातु विज्ञान में महारत के कारण इनलोगों को कुछ चमत्कारिक शक्तियाँ भी मिलती थी जिन्हें सिद्धि कहा जाता है। उदाहरण के लिए हवा या पानी पर चलना, आग से नहीं जलना, चीजों को गायब कर देना या फिर गायब चीजों को खोज लेना, तंत्र-मंत्र या जादू-टोना, वशीकरण, बीमारियों को ठीक कर देना, इत्यादि। हठयोगी कई तरह की ऐसी क्रियाएँ करते को सामान्य लोगों के वश की बात नहीं होती, जैसे एक लंबे समय तक बिना खाए रहना, किसी विशेष स्थिति में रहना आदि।

आम लोग उनके इन चमत्कारिक शक्तियों से एक तरफ प्रभावित होते थे तो दूसरी तरफ डरते भी थे। ज़्यादातर लोग इनके चमत्कारिक शक्तियों के कारण ही उनके पास अपनी समस्याओं के समाधान के लिए जाते थे या फिर उनके प्रति उत्सुकता के कारण। सम्मान से ज्यादा उनके प्रति लोगों में आश्चर्य, डर, रोमांच और उत्सुकता हुआ करता था। उनकी कठिन साधना सभी लोगों के वश की बात नहीं थी। इसलिए ये कभी मुख्य धारा के अंग नहीं बन पाए। पर एक छोटे समुदाय के रूप में ही सही पर उनकी उपस्थिति बनी रही। अभी हम जिन वाममार्गी साधुओं को देखते हैं उनमें सबसे प्रमुख हैं तांत्रिक, अघोरी, नागा और योगी, हालांकि उनके भी कई उपसंप्रदाय हैं।