समुद्र मंथन क्यों किया गया था?
जब हम कोई बहुत ही कठिन काम करते हैं, या किसी बड़ी जगह में कोई छोटी चीज ढूंढते हैं तो कई बार कह देते हैं, ये काम तो समुद्र मंथन जैसा है।
समुद्र मंथन की कहानी पुराणों की एक बहुत ही प्रसिद्ध कहानी है। इस संबंध में कई सवाल किए जाते हैं। जैसे क्या किसी समुद्र को मथना वैज्ञानिक रूप से संभव है? क्या यह हमार पूर्वजों की कपोल कल्पना है जो उन्होने टाइम पास करने के लिए किया था? क्या भगवान विष्णु ने देवताओं के पक्ष में बेईमानी की थी? जो सामान पहले ही होने का उल्लेख है उसे फिर से समुद्र से निकला क्यों बताया गया है? समुद्र मथने की जरूरत क्यों पड़ी? इससे क्या-क्या निकला? इत्यादि-इत्यादि।
क्यों किया गया समुद्र मंथन
यह कहानी इस प्रकार है कि एक बार ऋषि दुर्वासा ने एक विद्याधर स्त्री के हाथों में बहुत ही सुंदर और सुगंधित फूलों की माला देखा। वह माला संतानक नामक फूलों से बना था। उनके मांगने पर विद्याधर स्त्री ने वह माला उन्हें दे दिया। दुर्वासा ऋषि ने वह दिव्य माला पहन लिया। वे उस माला से बहुत खुश थे।
कुछ देर बाद उन्हें देवताओं के राजा इन्द्र मिले। उनके साथ बहुत से देवता भी थे। इन्द्र इस समय अपने ऐरावत नामक हाथी पर सवार थे। उन्हें यह हाथी बहुत प्रिय था। यह हाथी था भी बहुत सुंदर, शक्तिशाली और युद्ध कुशल।

ऋषि दुर्वासा और देवराज इन्द्र प्रेमपूर्वक मिले। दुर्वासा ने अपने गले में पड़े दिव्य फूलों की माला, जो कि उन्हें बहुत प्रिय था, को प्रेम के उपहार के रूप में इन्द्र को पहना दिया।
इन्द्र ने उसी समय प्रेम के उपहार के रूप में मिले हुए उस माला हो अपने प्रिय हाथी ऐरावत के सिर पर डाल दिया। माला के सुगंध से ऐरावत हाथी उन्मत्त हो गया। उसने माला को अपने सिर से उतार भूमि पर फेंक दिया और उस पर पैर रख दिया।
प्रेम से दिए गए अपने उपहार की यह दशा देख कर दुर्वासा ऋषि को क्रोध आ गया। उन्होने इन्द्र को शाप देते हुए कहा ”अरे ऐश्वर्य के मद से दुषितचित्त इन्द्र! तूने मेरी दी हुई इतनी सुन्दर माला का कुछ भी आदर नहीं किया, इसलिए तेरा त्रिलोकी का वैभव नष्ट हो जायेगा।“ “तूने मेरा अपमान किया है, मेरी दी हुई माला को पृथ्वी पर फेंका है इसलिए तेरा यह त्रिभुवन भी शीघ्र ही श्रीहीन हो जायेगा।”
शाप सुनते ही इन्द्र घबड़ा गए। वे ऐरावत से नीचे उतर कर दुर्वासा से क्षमा मांगने लगे। पर दुर्वासा ने उन्हें क्षमा नहीं किया और वहाँ से चले गए।
दुर्वासा का शाप सत्य हुआ। इन्द्र सहित तीनों लोक वृक्ष लता आदि के क्षीण हो जाने से श्रीहीन और नष्ट होने लगे। यज्ञों का होना बंद हो गया, तपस्वियों ने तप करना छोड़ दिया और लोगों की दान धर्म में रुचि नहीं रही। इस प्रकार त्रिलोक के श्रीहीन और सामर्थ्यहीन हो गया। इस अवसर का फायदा देवताओं के प्रतिद्वंद्वी दैत्यों ने उठाया। उन्होने देवताओं पर चढ़ाई कर दिया। दोनों पक्षों में घोर युद्ध हुआ। इस युद्ध में देवताओं की पराजय हुई।
पराजित और अपने वैभव से हीन हो चुके देवता ब्रह्मा की शरण में गए। ब्रह्मा उन्हें साथ लेकर विष्णु के शरण में गए। उन सबने भगवान विष्णु से सहायता मांगते हुए उनसे अपने खोए हुए राज्य और वैभव को फिर से पाने का उपाय पूछा।
भगवान विष्णु ने उनसे कहा “तुम लोग सम्पूर्ण औषधियाँ लाकर उसे क्षीर सागर में डालो। फिर क्षीर सागर का मंथन करो। इस मंथन के लिए मंदराचल पर्वत को मथनी और नागराज वासुकि को रस्सी बनाओ। इस समस्त कार्य में, अर्थात औषधियाँ डालने से लेकर मंथन तक में- दैत्यों का साथ लो। मैं भी आवश्यकता होने पर तुम्हारी सहायता करूंगा।” उन्होने देवताओं से यह भी कहा कि समुद्र मंथन से अमृत भी निकलेगा जिसके पीने से वे सब देवता सबल और अमर हो जाएंगे। देवताओं को भय हुआ कि दैत्य तो पहले से ही इतने शक्तिशाली थे। अगर उन्हें अमृत मिल जाता तब तो वे और भी शक्तिशाली होकर देवताओं को और परेशान करते। पर भगवान विष्णु ने उन्हें इस भय से निर्भय कर दिया।
अमृत के लालच में देवताओं के चीर प्रतिद्वंद्वी दैत्य भी समुद्र मंथन में उनका सहयोग करने के लिए तैयार हो गए। इस समय देवताओं के राजा इंद्र और दैत्यों के राजा बलि थे।
समुद्र मंथन
भगवान विष्णु की सलाह के औंसार देवताओं और दानवों ने समस्त औषधियों को लाकर क्षीर सागर में डाल दिया। फिर उन्होने मंदराचल को मथनी और वासुकि नाग को रस्सी बना कर क्षीर सागर को मथना शुरू किया।

सबसे पहले समस्या शुरू हुई कि देवता और दैत्यों में से कौन वासुकि को मुंह की तरफ से पकड़ेगा और कौन पुंछ की तरफ से। दैत्यों ने स्वयं ही मुंह की तरफ से पकड़ना चाहा क्योंकि उनकी नजर में पूंछ पकड़ने से उनकी तौहीन होती।
जब मंथन शुरू हुआ तब उनके वासुकि नाग की गर्म साँसों से दैत्य झुलसने लगे। दूसरी तरफ एक तो देवता उनकी पुंछ की तरफ होने के कारण साँसों से दूर थे, दूसरा वासुकि के साँसों से मेघ विच्छिन्न हो कर पूंछ कि तरफ जाकर बरसने लगे। इससे भी उन्हें राहत मिल रहा था। परिणाम यह हुआ कि दैत्य निष्तेज और देवता तेजवान होने लगे।
दूसरी समस्या यह उत्पन्न हुई कि मथनी के रूप में स्थित मंदराचल समुद्र में डूबने लगा। उसे स्थिर रखने के लिए भगवान विष्णु ने स्वयं कूर्म यानि कछुवे का अवतार लिया। कछुआ रूप धारी विष्णु मंदराचल के नीचे जाकर उसे अपनी पीठ पर टिका लिया।
समुद्र मंथन के समय भगवान विष्णु चार रूपों में वहाँ उपस्थित थे। के कछुआ के रूप में मंदराचल के नीचे। दूसरे मंदराचल के ऊपर रह कर उसे स्थिर रखा हुआ था। देवता और दानव दोनों के दो रूप में रह कर वे दोनों दलों की शक्ति को बढ़ा रहे थे। इस तरह उनके सहयोग से समुद्र मंथन का काम सुचारु रूप से चलने लगा। मंथन से निकले अमृत को बांटने के लिए उन्होने एक अत्यंत सुंदर स्त्री का रूप लिया जो कि मोहिनी कहलाया।
इस तरह समुद्र मंथन से संबन्धित विष्णु के दो प्रकट अवतार हुए- कच्छ्प का और मोहिनी का। तीन अदृश्य रूप में वे मंथन काल में उपस्थित थे- एक मंदराचल के ऊपर और दो रूपों में दोनों दलों में शामिल थे।
समुद्र मंथन से कौन-कौन से चौदह रत्न निकले थे?
क्षीर सागर नामक समुद्र का मंथन किया तो जा रहा था अमृत के लिए लेकिन इसमें इसके साथ और भी बहुत कुछ निकला। सुख-समृद्धि की देवी लक्ष्मी, आयुर्वेद के जन्मदाता धन्वन्तरी, रंभा नामक अप्सरा आदि भी इसमें शामिल थे। लक्ष्मी के उत्पत्ति की कथा होने के कारण माना जाता है कि समुद्र मंथन की कथा सुनने से देवी लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं।
समुद्र मंथन से जो चीजें निकली थीं, उनकी संख्या चौदह थी। इन्हें 14 रत्न कहा जाता है।
1. कालकूट विष
समुद्र मंथन से जो सबसे पहला चीज निकला वह था कालकूट विष। वह इतना विषैला था कि उससे समस्त संसार का नाश हो सकता था। देवताओं और दैत्यों के निवेदन पर भगवान शिव ने उस विष को अपने कंठ में धरण कर लिया क्योंकि इस विष को सहन करने की शक्ति उनके अतिरिक्त और किसी में नहीं था। इसी कारण उनका कंठ नीला पड़ा और वे नीलकंठ कहलाए। विष की कुछ बुँदे जमीन पर गिरि जिसे उन जीवों और वनस्पतियों ने लिया जिसे हम विषैले कहते हैं, जैसे सांप, बिच्छू, धतूरा आदि।

2. कामधेनु गाय
गाय चूंकि यज्ञ में काम आ सकती थी इसलिए उसे ऋषियों को दे दिया गया।
3. उच्चैःश्रवा घोड़ा
इस घोड़े की विशेषता यह थी कि यह मन की गति से चल सकता था। यह दैत्यों के राजा बलि को दे दिया गया।
4. ऐरावत हाथी
यह सफ़ेद रंग का एक अत्यंत सुंदर और शक्तिशाली हाथी था। चूंकि यह पहले से ही इन्द्र का वाहन था, इसलिए यह इन्द्र को मिला।
5. कल्प वृक्ष
यह स्वर्ग में रहने वाला एक वृक्ष था। इसकी विशेषता यह थी कि इसके नीचे जो भी इच्छ कोई करता था, वह उस इच्छा की पूर्ति करता था। चूंकि यह स्वर्ग की संपत्ति था इसलिए इसे देवताओं को दे दिया गया।
6. देवी लक्ष्मी
देवी लक्ष्मी भगवान विष्णु की पत्नी थी और किसी कारण से उनसे नाराज होकर समुद्र में चली गई थीं। वह सुख, समृद्धि और सौभाग्य देने वाली देवी थी। अतः देवता और दैत्य दोनों उन्हें पाना चाहते थे। अंत में यह सहमति हुई कि यह उन पर ही छोड़ दिया जाय कि वह किसका वरन करती हैं। लक्ष्मी जी से स्वयं भगवान विष्णु का वरण कर लिया।
7. चंद्रमा
जो सातवीं चीज समुद्र समुद्र से निकला वह था चंद्रमा। ज्योतिषी में चंद्रमा हो जल का कारक ग्रह भी माना जाता है। भगवान शंकर ने चंद्रमा को अपने माथे पर धारण किया।
8. पांचजन्य शंख
समुद्र से एक अत्यंत विशिष्ट शंख भी निकला। इसका नाम था पांचजन्य। देवता और दानवों ने आपसी सहमति से इसे भगवान विष्णु को दे दिया। इस शंख को जीत का प्रतीक माना जाता है। यह विष्णु को अत्यंत प्रिय है और हमेशा उनके हाथ में रहता है। विष्णु ने जब कृष्ण का अवतार लिया था तब भी यह उनके साथ था।
9. कौस्तुभ मणि
यह दुर्लभ मणि भी भगवान विष्णु को ही मिला। यह हमेशा उनके वक्ष स्थल पर रहता था।
10. अप्सरा रंभा
रंभा एक अत्यंत सुंदर अप्सरा थी। वह भी समुद्र मंथन से प्रकट हुई थी। वह देताओं को मिली। वह देव लोक की प्रमुख अप्सरा थी।
11. वारुणी मदिरा
यह एक मदिरा यानि शराब था। इसे दैत्यों ने रख लिया।
12. पारिजात वृक्ष
इसे शास्त्रों में स्वर्ग का फूल कहा गया है। हर्श्रिंगार या रातरानी को पारिजात का फूल माना जात है। यह फूल भगवान शिव को बहुत प्रिय है।
13. धन्वन्तरी भगवान
यह एक महान चिकित्सक थे। इन्हें औषधियों का ज्ञान था। इन्हें देवताओं ने अपना चिकित्सक बना लिया। इन्हें ही आयुर्वेद का जन्मदाता माना जाता है। ये उन चौदह रत्नों में से 13वें थे जो समुद्र मंथन से निकले थे।
14. अमृत
वह वस्तु जिसके लिए समुद्र मंथन किया गया था वह अमृत ही था। इसे लिए हुए भगवान धन्वन्तरी प्रकट हुए। दैत्य समुद्र मंथन में देवताओं का साथ अमृत को पाने के लिए ही दे रहे थे। अमृत देखते ही वे सब देवताओं से इसे छिनने लगे। दैत्य भी अमृत के लिए आपस में लड़ने लगे। इस लड़ाई-झगड़े में कोई भी अमृत नहीं पी पा रहा था। सभी लड़ रहे थे।
इस स्थिति को संभालने के लिए फिर भगवान विष्णु आगे आए। वे अत्यंत सुंदर स्त्री के रूप में वहाँ आ गए। उनके रूप को देख कर देवता-दानव सभी मोहित हो गए। इसलिए उनका यह रूप या अवतार मोहिनी कहलाया। मोहिनी रूपधारी भगवान विष्णु ने दोनों पक्षों को झगड़ा छोड़ कर पंक्ति में बैठने के लिए कहा ताकि वे दोनों को अमृत पिलाती। उनके रूप से सम्मोहित दैत्य भी उनकी बात मान गए।

उन्होने देवताओं की पंक्ति से अमृत बांटना शुरू किया। राहू नामक दैत्य को यह शंका हुआ कि कहीं सारा अमृत देवताओं में ही न खतम हो जाए। इसलिए वह देवता का रूप बना कर उनकी पंक्ति में बैठ गया। उसके पास ही बैठे सूर्य और चंद्रमा उसे पहचान गए। तब तक मोहिनी रूप धारिणी विष्णु ने राहू को अमृत दे दिया। लेकिन देते ही सूर्य-चंद्रमा ने उसके दानव होने की बात बता दिया। विष्णु भी उसे पहचान गए। उन्होने तुरंत ही चक्र से राहू का सिर काट डाला। इस समय तक अमृत की बुँदे उसके गले तक पहुँच चुका था। अतः वह सिर कटने से भी मरा नहीं। उसका सिर राहू और धड़ केतू कहलाया।
राहू का सिर कटते ही वहाँ हलचल मच गया। दानवों की तंद्रा टूटी। मोहिनी रूप धारिणी विष्णु वहाँ से अन्तर्धान हो गए। बचा हुआ अमृत लेकर देवता स्वर्ग चले गए।
अमृत पीने के बाद देवता पुनः शक्तिशाली और मृत्यु रहित हो गए। अमृत से वंचित दानव अब उनके मुक़ाबले कमजोर पड़ गए। परिणाम यह हुआ कि देवताओं ने उनसे पुनः अपना राज्य और सारा वैभव वापस ले लिया।
समुद्र से निकले चौदह वस्तुओं में से विष और चंद्रमा भगवान शंकर ने लिया।
पांचजन्य शंख, कौस्तुभ मणि और देवी लक्ष्मी भगवान विष्णु को मिले।
उच्चैःश्रवा घोड़ा दैत्यों के राजा बलि ने और वारुणी मदिरा सभी दैत्यों ने लिया।
ऐरावत हाथी देवताओं के राजा इन्द्र ने और कल्पवृक्ष, पारिजात फूल, अप्सरा रंभा और वैद्याचर्या धन्वन्तरी देवताओं के राज्य स्वर्ग को मिली। अमृत देवताओं को मिला। कामधेनु गाय ऋषियों को मिली।
समुद्र मंथन की कहानी का वास्तविक रहस्य क्या है?
समुद्र मंथन हमारे पुराणों की एक अत्यंत प्रसिद्ध कहानी है। इस संबंध में कई सवाल किए जाते हैं। जैसे क्या किसी समुद्र को मथना वैज्ञानिक रूप से संभव है? क्या यह हमार पूर्वजों की कपोल कल्पना है जो उन्होने टाइम पास करने के लिए किया था? क्या भगवान विष्णु ने देवताओं के पक्ष में बेईमानी की थी? जो सामान पहले ही होने का उल्लेख है उसे फिर से समुद्र से निकला क्यों बताया गया है?
इस संबंध में जो सबसे पहला और मौलिक प्रश्न है, वह है कि क्या किसी समुद्र को मथना, वह भी एक विशाल पहाड़ और एक विशाल सांप की सहायता से, व्यावहारिक रूप से संभव है? अन्य अनेक प्रश्नों की तरह इसके भी दो तरह के उत्तर दिए जाते हैं।
एक मत के अनुसार ईश्वर की बातें तर्कबुद्धि से पड़े होती हैं, शास्त्र में ईश्वरीय बाते लिखी हैं। इसलिए इस पर मानव बुद्धि नहीं लगानी चाहिए।
दूसरा मत यह है कि यह यह असंभव कपोल कल्पना है। कम से कम अब तक जो हमारा ज्ञान है, उससे यह किसी भी हालत में संभव नहीं है। इसका कोई प्रमाण भी नहीं है।
तीसरा मत इन दोनों अति से बचता है। इसके अनुसार शास्त्रों में जो बाते लिखी हैं उसका शब्दशः अर्थ नहीं लिया जाना चाहिए। क्योंकि यह सब संकेतों और कहानियों के माध्यम से एक विचार लोगों तक पहुंचाने का तरीका है। कहानी द्वारा हम चीजों को visualize करते हैं। इसलिए कहानियों के माध्यम से बहुत-सी जटिल सिद्धान्त और बातें लोगों को आसानी से समझ में आ आ जाती हैं। कहानियाँ बहुत दिनों तक मस्तिष्क में रहती हैं और पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती रहती हैं। इसलिए इन कहानियों को सांकेतिक कहानियों के रूप में देखना चाहिए जो कई व्यावहारिक संदेश सरलता से आम लोगों तक पहुंचाती है। समुद्र मंथन की कहानी भी ऐसी ही है।
इस संबंध में जो दूसरा प्रश्न होता है, और जो उपर्युक्त तीनों मतों के लोगों द्वारा पूछा जाता है, वह है, क्या भगवान विष्णु ने देवताओं के में पक्ष में बेईमानी की थी? इसका उत्तर है नहीं। क्योंकि दानवों के गुरु शुक्र आचार्य के पास मृत संजीवनी विद्या थी जिसके कारण युद्ध में मरने वाले असुर को वे फिर से जीवित कर देते थे। इसलिए देवता लोग उनसे हार जाते थे। देवताओं ने शुक्र आचार्य से यह विद्या सीखने के लिए बहुत प्रयत्न किए। यहाँ तक कि देव गुरु बृहस्पति के पुत्र कच ने बहुत दिनों तक शुक्र आचार्य के पास रह कर उन्हें प्रसन्न कर इस विद्या को सीखने का प्रयत्न किया था। पर दानवों के चालों के कारण देवता अपने प्रयास में विफल हो जाते थे। इसलिए विष्णु ने देवताओं को अमृत पिला कर मुक़ाबला बराबरी कर कर दिया था। ऐसी कथा है।
