सतत अभ्यास का महत्व

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सदियों पहले की बात है। एक बालक पढ़ने के लिए गुरुकुल गया। लेकिन उसकी स्मरण शक्ति बहुत कम थी। पाठ ठीक से समझ भी नहीं पाता था। दूसरे विद्यार्थी उसे ‘महामूर्ख’ कह उसका मज़ाक बनाने लगे।

गुरु ने बहुत प्रयास किया कि उसे कुछ सीखा सकें। पर, वे सफल नहीं हुए। वह कई वर्षों तक एक ही कक्षा में रहा क्योंकि वह कोई परीक्षा उतीर्ण ही नहीं कर पाता था। एक दिन वह समय भी आया जब गुरु जी ने उससे सारी उम्मीद छोड़ कर उसे वापस अपने घर जाने के लिए कहा।

वह ‘महामूर्ख’ बालक भी जनता था कि वह दूसरे बच्चों की तरफ बुद्धिमान नहीं है। गुरु की बात मानते हुए वापस घर जाने के लिए तैयार हो गया। उसने मान लिया कि विद्या उसकी किस्मत में नहीं है। अपने से निराश हो कर वह अपने घर जा रहा था।

रास्ते में उसे प्यास लगी। पानी पीने के लिए वह एक कुएँ पर गया। उस विद्यार्थी ने देखा कि कुएँ पर एक निशान पड़ा हुए था। वहीं पानी भर रही एक महिला से उसने पूछा कि ‘आपने ये निशान कैसे बनाया?’ महिला ने जवाब दिया कि ये उसने नहीं बनाया बल्कि पानी भरने के लिए बाल्टी इस रस्सी के सहारे कुएँ में जाता है। बार-बार लगातार रस्सी के रगड़ से कुएँ पर निशान बन गए हैं।

वह विद्यार्थी सोचने लगा कि एक कोमल रस्सी से बार-बार रगड़ने से कठोर पत्थर पर भी निशान बन गया। अगर कम बुद्धि वाला व्यक्ति बार-बार अभ्यास करे तो जरूर कुछ सीख सकता है। उसे लगातार परिश्रम और अभ्यास का महत्त्व समझ में आ गया। वह एक नए आत्मविश्वास से फिर से गुरु आश्रम में लौट आया।

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उसकी स्मरण शक्ति अधिक नहीं थी लेकिन इस कमी को वह अपने कठिन परिश्रम और अभ्यास से पूरा करने लगा। इसका परिणाम भी उसे मिला। वह विद्यार्थी आगे चले कर संस्कृत व्याकरण का महान ज्ञाता बना।

यह प्रसिद्ध कहानी है वरदराज की। उनके गुरु का नाम था भट्टोजि दीक्षित।

आगे चल कर उसी मंदबुद्धि बालक वरदराज ने अनेक ग्रंथ लिखा। उनके लिखे ग्रन्थों में  लघुसिद्धान्‍तकौमुदी, मध्‍यसिद्धान्‍तकौमुदी, सारसिद्धान्‍तकौमुदी, गीर्वाणपदमंजरी अधिक ख्यात है।

उसके तीन ग्रंथ लघुसिद्धान्‍तकौमुदी, मध्‍यसिद्धान्‍तकौमुदी, सारसिद्धान्‍तकौमुदी उसके गुरु के लिखे ग्रंथ ‘सिद्धान्त कौमुदी’ पर भाष्य हैं। सच है “करत-करत अभ्यास ते जड़मति होत सूजान, रसरी आवत-जात ते शिल पर पड़त नीसान।”

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