भगवान शिव के गले में एक नाग रहता है। इस नाग का नाम है वासुकि नाग। यह कौन था और शिव ने उसे अपने गले में क्यों धारण किया, इसके बारे में जो पौराणिक कहानियाँ है, उस पर बात करेंगे, पर उससे पहले देखते हैं कि वासुकि नाग के बारे में और क्या कहानियाँ हैं।
याद आया? वासुकि नाग की चर्चा कहाँ सुना है? भगवान कृष्ण का जन्म मथुरा के कारगार में हुआ था। उनके पिता वसुदेव जी उन्हें रात के अंधेरे में वहाँ से लेकर गोकुल अपने मित्र नन्द जी के घर जा रहे थे। रास्ते में यमुना पार करना था। तेज बारिस हो रही थी। इस समय यमुना में अपने फण की छत्र छाया देकर बारिश से बचाने वाले नाग वासुकि ही थे। बहुत लोग गलती से उन्हें शेष नाग मानते हैं पर ऐसा नहीं है। शेष नाग की कहानी और किसी दिन।

समुद्र मंथन के समय जो नाग ने रस्सी का काम किया था, वह भी वासुकि ही थे।
जनमेजय के सर्प यज्ञ में जल कर मरने से नागों को बचाने वाले भी वासुकि ही थे। वह कौन थे और नागों को कैसे बचाया ये कहानी भी संक्षेप में देख लेते हैं।
वासुकि कश्यप ऋषि और कद्रु के पुत्र थे। कश्यप ऋषि ने दो विवाह किए थे। उनकी दोनों पत्नियाँ कद्रु और विनीता सगी बहनें थीं। विनीता का नाम विनता भी मिलता है। दोनों में कभी नहीं बनती थी और दोनों ही एक दूसरे को नीचा दिखने के लिए मौका ढूंढती रहती थीं। कश्यप ऋषि ने दोनों पत्नियों से वरदान मांगने के लिए कहा। कद्रु ने 1000 शक्तिशाली पुत्र होने का वरदान मांगा। विनीता ने कद्रु के पुत्रों से अधिक शक्तिशाली और भगवान के भक्त केवल दो पुत्र मांगे।
कद्रु को 1000 नाग पुत्र हुए। इनमें सबसे बड़े थे वासुकि। विनीता के दो पुत्र हुए जिनके नाम थे अरुण और गरुड़। अरुण भगवान सूर्य के सारथी बने और गरुड़ भगवान विष्णु के वाहन।
जैसे देवता और दानव एक ही पिता के दो माओं – दिति और अदिति के पुत्र थे पर आपस में दुश्मनी रखते थे। वैसे ही गरुड़ और नाग एक ही पिता के दो माओं से उत्पन्न संतान थे लेकिन आपस में दुश्मनी रखते थे।
कद्रु और उसके पुत्र विनीता और बाद में उसके पुत्र गरुड़ को हमेशा कष्ट देते रहते थे। यह बात कद्रु के बड़े बेटे वासुकि को पसंद नहीं थी। समझाने पर भी जब माँ और भाई उनकी बात नहीं माने तब वे घर छोड़ कर किसी द्वीप पर अकेले रहने चले गए। उनके कुछ समर्थक संबंधी और सहयोगी वहाँ भी उनसे संपर्क में रहें।
वासुकि भगवान शिव के बहुत भक्त थे। वहीं रह कर वे शिव की तपस्या करते रहते थे। उनकी हमेशा एक ही इच्छा होती थी कि किसी तरह शिव उन्हें अपने पास रखें।
इधर घर में क्रोधित होकर उनकी माँ कद्रु ने अपने ही उन बेटों को शाप दे दिया कि वे सब जनमेजय के सर्प यज्ञ में जल कर मर जाएंगे, जिन्होने विनीता को धोखा देने की उसकी योजना में साथ नहीं दिया था। अन्य बेटे डर कर उसका साथ देने लगे।
जब इस शाप की बात वासुकि को पता चला तो वह बहुत दुखी हुए। वे इस विनाश से अपने भाइयों और सभी नागों की रक्षा करना चाहते थे। वे शाप से बचने का उपाय खोजने लगे। उन्हें पता चला कि जरत्कारु ऋषि का अगर उनके नाम की लड़की से विवाह हो जाए तब इस दंपति का बेटा सर्प यज्ञ को रोक सकता है।
वासुकि ने अपनी बहन का नाम जरत्करु रखा। समय आने पर जरत्करु ऋषि को खोज कर उनसे अपनी बहन का विवाह करवा दिया। इस युगल को एक बेटा हुआ जिसका नाम था आस्तिक। इसी आस्तिक मुनि ने जनमेजय का सर्प यज्ञ रोक कर नागों की रक्षा की थी।
अब हम आते हैं अपने पहले प्रश्न पर कि शिव ने वासुकि को अपने गले में क्यों धारण किया था। इसका जवाब समुद्र मंथन से जुड़ा हुआ है। देवता और दानवों ने जब क्षीर समुद्र को मंथने का विचार किया तो सबसे पहला प्रश्न यही आया कि इतना बड़ा मंथनी और रस्सी कहाँ से आए। मंथनी के रूप में मंदराचल पर्वत और रस्सी के रूप में वासुकि नाग का नाम सुझाया गया।

वासुकि जानते थे कि इससे उनके शरीर को बहुत कष्ट होगा। उन्हें अमृत पाने और अमर होने का भी कोई लालच नहीं था। दानव अमर होने की लालच में देवताओं का साथ दे रहे थे हालांकि अमर होने के लिए उनके पास मृत संजीवनी विद्या पहले से ही थी। पर वासुकि ने ऐसी कोई शर्त नहीं रखी। वह तो केवल दूसरों के हित के लिए कष्ट सह कर रस्सी बनाने को तैयार हो गए।
समुद्र मंथन से सबसे पहले कालकूट नामक विष निकला। सृष्टि के हित के लिए, सबको बचाने के लिए शिव ने उसे पी कर अपने कंठ में रख लिया। इस विष के प्रभाव से उन्हें थोड़ी सी जलन होने लगी। वासुकि नाग यह सब देख रहे थे। वह खुद भी बहुत घायल थे। उनकी चमड़ी जगह-जगह से छिल गई थी। फिर भी शिव का कष्ट उनसे देखा नहीं गया। उन्होने उस घायल अवस्था में भी शिव के विष का थोड़ा सा भाग स्वयं ले लिया।
शिव उनकी भक्ति और परोपकार की भावना से बहुत प्रसन्न हुए। वह वासुकि की इच्छा जानते थे कि वह उनके पास रहना चाहते थे। इसलिए उन्होने उन्हें हमेशा के लिए गले से लगा लिया।
देवता और दानव अमर होने के लिए अमृत पाना चाहते थे। लेकिन वासुकि विष पी कर भी अमर हो गए और हमेशा के लिए शिव के सम्मुख रह गए।
उन्होने न तो अमरत्व की कामना की थी, न ही मोक्ष की। न उन्हें बहुत बड़ा पद या नाम चाहिए था। वे तो बस निःस्वार्थ भाव से दूसरे का भला करना चाहते थे भले ही स्वयं उन्हें इसके लिए कष्ट ही क्यों न उठाना पड़े। और इसी भावना ने उन्हें विष पी कर भी अमर कर दिया।
कहानियाँ हमें कुछ सिखाने के लिए होती हैं। लेकिन इस सबक को लेने के बदले बहुत से लोग शिव का नाम लेकर नशा कर लेते हैं। शिव आपका रूप रंग, आकार-प्रकार, जाति- धर्म आदि नहीं देखते बल्कि भावना देखते हैं। भावना अच्छी हो तो नाग को भी गले से लगा सकते हैं।
