शाम तक की मोहलत

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एक राजा ने किसी बात से नाराज होकर अपने एक मंत्री को मृत्युदंड दे दिया। इस आदेश का तामिल उसी दिन शाम को होना था।

संयोग से उस दिन उस मंत्री का जन्मदिन भी था। जन्मदिन का उत्सव मनाने उसके परिवार और पड़ोस से बहुत से लोग आए हुए थे। जब यह सूचना मंत्री के घर पहुंची तो वहाँ उत्सव मनाने के लिए जमा हुए लोगों में निराशा और शोक छा गया। लेकिन मंत्री बिल्कुल ही सामान्य था। उसके चेहरे पर कोई शिकन तक नहीं थी।

लोग उसे देख कर आश्चर्य में थे। मंत्री ने सामान्य रूप से लोगों से कहा फांसी तो शाम को लगनी है, शाम तक का समय तो है हमारे पास। इस समय को रो-धो कर खोने से अच्छा है आज जिस उत्सव को मनाने के लिए मेरे सगे-संबंधी यहाँ एकत्र हुए हैं, उसे मनाते हुए इस समय का सार्थक उपयोग किया जाय। मैं तो खुशनसीब हूँ जो मुझे मौत से पहले मौत की सूचना मिल गई लेकिन अधिकांश लोग तो ऐसे होते हैं जिन्हें बिना किसी सूचना के मृत्यु आ जाती है। इसलिए इस अटल सत्य से डरने के बदले जीवन के हर क्षण को आनंद के साथ जिया जाय।

मंत्री की बातों को सुन एकत्र लोग फिर से उत्सव मनाने लग गए। यह दृश्य देख कर राजा के दूत बहुत आश्चर्यचकित हो गए। उन्होने राजा को जाकर सारी बात बताया। राजा ने मंत्री को बुला कर जश्न का कारण पूछा जबकि कुछ ही घंटो में उसकी मृत्यु होने वाली थी। मंत्री ने बिल्कुल सहज भाव से अपने तर्क उसके सामने रख दिया। उसने राजा का आभार भी प्रकट किया क्योंकि उसने कुछ घंटों का समय दिया था उसे जिसे वह अपने लोगों के साथ बिता सकता था। राजा उसके जीवन को उसकी पूर्णता के साथ जीने की इस उत्कट अभिलाषा से बहुत प्रभावित हुआ और उसकी मृत्युदंड के आदेश को वापस ले लिया।

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