रहट की अवाज

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एक किसान बैलों द्वारा रहट (पानी निकालने का एक यंत्र) चला कर कुएं से पानी निकाल रहा था। इस पानी से वह अपने खेतों की सिंचाई कर रहा था। गर्मी का मौसम था। एक घुड़सवार उस रास्ते से गुजरा। गर्मी के कारण सवार और उसके घोड़े- दोनों का प्यास से बुरा हाल था। घुड़सवार ने किसान से रहट से पानी पीने की अनुमति मांगी। किसान ने सहर्ष हामी भर दिया। घुड़सवार ने पानी पिया। लेकिन यह क्या? जब घोड़ा पानी पीने आया तो वह रहट से निकलने वाले “ठक ठक” की आवाज से डर गया। जब बैल रहट चलाते, तो पानी आता, साथ ही आवाज भी आती। इससे घोड़ा डर कर भाग जाता। लेकिन जब बैल रुक जाते, तब आवाज भी रुक जाती तब घोड़ा पानी पीने आता, लेकिन रहट रुके हुए होने के कारण पानी नहीं मिल पाता था उसे। यही क्रम कई बार चला। 

       परेशान घुड़सवार ने किसान से उपाय पूछा। ऐसे तो प्यासा घोड़ा पानी नहीं पी पाता। किसान ने अपनी असमर्थता जताया। उसने बताया पानी के साथ आवाज तो रहेगी ही। इसलिए अगर पानी पीना है तो घोड़ा को उसी आवाज के बीच डर छोड़ कर पानी पीना होगा क्योंकि पानी और आवाज दोनों साथ ही रहेंगे।

       यही हाल हमलोगों का भी होता है। जीवन की परेशानियाँ रहट के ‘ठक ठक’ के आवाज की तरह होती है। इन्हीं परेशानियों के बीच कुछ अच्छी चीजें ‘पानी’ की तरह आती हैं। अगर हम आवाज से डर जाएंगे तो पानी नहीं पी पाएंगे। अर्थात अगर हम इन परेशानियों से डर जाएंगे तो जीवन का आनंद नहीं ले पाएंगे और जीवन के अच्छाइयों को नहीं देख पाएंगे। इसलिए जीवन जीने की कला यही है कि रहट की आवाज यानि परेशानियों को नजरंदाज कर जीवन का आनंद लिया जाय।

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