‘सन्देश यहाँ मैं नहीं स्वर्ग का लाया
इस भुतल को ही स्वर्ग बनाने आया’
इतना निसंकोच घोषणा करने वाले थे मैथिली शरण गुप्त जिन्हें गाँधी जी ने राष्ट्र कवि की उपाधि दी थी।
लेकिन वे नीरस कर्तव्य पाथ के पथिक मात्र नहीं थे। प्रकृति के सौन्दर्य का चित्र खींचने में भी उनकी कलम कुशल थे। उनके खंड काव्य पंचवटी में इसकी कुछ सुंदर झलकियाँ है:
‘चारुचंद्र की चंचल किरणें, खेल रहीं हैं जल थल में,
स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई है अवनि और अम्बरतल में।’
‘पुलक प्रकट करती है धरती, हरित तृणों की नोकों से,
मानों झीम रहे हैं तरु भी, मन्द पवन के झोंकों से॥’
या फिर

‘क्या ही स्वच्छ चाँदनी है यह, है क्या ही निस्तब्ध निशा;
है स्वच्छन्द-सुमंद गंध वह, निरानंद है कौन दिशा?’
लेकिन देश प्रेम और प्रकृति की सुंदरता में खो कर वे मानव मन की पीड़ा को नहीं भूलते हैं। उर्मिला और यशोधरा के पीड़ा भी उन्हें पीड़ित करती है:
‘सखी वे मुझ से कह कर जाते,
जाते तो क्या वह मुझे अपनी भव बाधा ही पाते।’
समदर्शिता का इससे बड़ा उदाहरण क्या होगा:
‘मैं मनुष्यता को सुरत्व की
जननी भी कह सकता हूँ
किन्तु पतित को पशु कहना भी
कभी नहीं सह सकता हूँ।’
इन पंक्तियों के रचनाकार का नाम है मैथिली शरण गुप्त।
भाषा एवं साहित्य को उनका योगदान
वे खड़ी बोली के पहले महत्वपूर्ण कवि माने जाते हैं। खड़ी बोली में रचना करने की प्रेरणा उन्हें आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी से मिला था। खड़ी बोली यानि कि सामान्य लोगों द्वारा बोली जाने वाली सामान्य हिन्दी। इस समय भक्ति परंपरा को कायम रखते हुए ब्रज भाषा में काव्य रचना हो रही थी। उत्तर प्रदेश उनकी उनकी जन्म स्थली थी लेकिन फिर भी उन्होने हिन्दी को अपनी रचनाओं का आधार बनाया। इसके बाद बड़ी संख्या में खड़ी बोली यानि हिन्दी में उच्च कोटी की रचनाएँ होने लगी।
उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं:
भारत-भारती (1912), पंचवटी, जयद्रथ वध, यशोधरा, साकेत, सिद्धराज, विश्ववेदना, रंग में भंग, इत्यादि।
उनके विशाल रचना संसार का अनुमान इस सूची से होता है।
2 महाकाव्य – साकेत 1931, यशोधरा 1932;
19 खंड काव्य – जयद्रथ वध 1910, भारत-भारती 1912, पंचवटी 1925, द्वापर 1936, सिद्धराज, नहुष, अंजलि और अर्घ्य, अजित, अर्जन और विसर्जन, काबा और कर्बला, किसान 1917, कुणाल गीत, गुरु तेग बहादुर, गुरुकुल 1929, जय भारत 1952, युद्ध, झंकार 1929 , पृथ्वीपुत्र, वक संहार , शकुंतला, विश्व वेदना, राजा प्रजा, विष्णुप्रिया, उर्मिला, लीला, प्रदक्षिणा, दिवोदास, भूमि-भाग), काव्यगीत;
नाटिका – रंग में भंग 1909, राजा-प्रजा, वन वैभव , विकट भट, विरहिणी, वैतालिक, शक्ति, सैरन्ध्री , स्वदेश संगीत, हिड़िम्बा , हिन्दू, चंद्रहास, इत्यादि
गुप्त जी ने विविध विधाओं में अनेक रचनाएँ की। अनघ, चरणदास, तिलोत्तमा और निष्क्रिय प्रतिरोध उनके मौलिक नाटक हैं। केशों की कथा, स्वर्गसहोदर जैसी फुटकर रचनाएँ भी हैं।
उनकी कविताओं का मूल स्वर है राष्ट्रीय चेतना, धार्मिक उत्थान, और मानवीय प्रगति एवं प्रेम की अभिव्यक्ति।
‘भारत भारती’ तीन खंडो का एक महाकाव्य है जिसमें देश के भूत, वर्तमान और भविष्य का चित्रण है। भारत-भारती देशवासियों में राष्ट्र प्रेम जगाने का एक माध्यम बन गया। इसीलिए राष्ट्र पिता महात्मा गाँधी ने उन्हें ‘राष्ट्रकवि’ का सम्बोधन दिया। उनके जन्म दिवस 3 अगस्त को ‘कवि दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।
उनकी सभी कृतियों को वाणी प्रकाशन ने 12 खंडो में संग्रहीत कर मैथिली शरण गुप्त ग्रंथावली नाम से प्रकाशित किया है।
साकेत में उन्होने भगवान राम के छोटे भाई लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला की पीड़ा का विवरण दिया है। वे संभवतः पहले कवि थे जिन्होने उर्मिला, यशोधरा जैसे सदियों से उपेक्षित चरित्र को अपनी अभिव्यक्ति का मुख्य माध्यम बनाया। उनकी पीड़ा के माध्यम से उन्होने नारियों की पीड़ा की तरफ ध्यान खींचा।

सरस्वती के अलावा उनकी रचनाएँ प्रताप, इन्दु, प्रभा जैसी पत्रिकाओं में भी छपती थी। प्रताप में उन्होने ‘विदग्ध हृदय’ नाम से भी कई रचने लिखी। उनके पत्रों का संग्रह ‘पत्रावली’ और कविताओं का संग्रह ‘उच्छ्वास’ नाम से भी प्रकाशित हुआ।
उन्होने बंगला भाषा के काव्य ग्रंथ ‘मेघनाद वध’ का अनुवाद ‘ब्रजांगना’ नाम से किया। विरहिणी, पलासी का युद्ध आदि का भी उन्होने बंगला से हिन्दी में अनुवाद किया।
उन्होने संस्कृत ग्रन्थ “स्वप्नवासवदत्ता” का अनुवाद किया। इसके अलावा प्रतिमा, अभिषेक, अविमारक, रत्नावली आदि संस्कृत ग्रन्थों का अनुवाद भी किया।
इतना ही नहीं उमर खय्याम के रुबाइयों का भी उन्होने अनुवाद किया। कई अनुवाद कार्य उन्होने ‘मधुप’ नाम से किया था।
भाषा, साहित्य और राष्ट्रभक्ति की उनकी रचनाओं के कारण भारत सरकार ने 1954 में उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया। उनकी सबसे अधिक सम्मानित रचना साकेत के लिए उन्हें 1935 में हिंदुस्तान अकादमी पुरस्कार और 1937 में हिन्दी साहित्य सम्मेलन का मंगला प्रसाद पुरस्कार मिला। साहित्य वाचस्पति (1946) सहित अनेक सम्मानों से उन्हें सम्मानित किया जा चुका है। भारत सरकार ने उनके सम्मान में विशेष डाक टिकट भी जारी किया।
मैथिली शरण गुप्त जी का जन्म वर्तमान उत्तर प्रदेश में झांसी के पास चिरगांव में 3 अगस्त 1886 को हुआ था। स्कूल में पढ़ाई से ज्यादा उनका मन खेलकूद में लगता था। परिणाम यह हुआ कि स्कूल की पढ़ाई ज्यादा नहीं कर सके। लेकिन घर में ही हिन्दी, बांग्ला और संस्कृत साहित्य का अध्ययन किया। इससे उनकी सहज साहित्यिक प्रतिभा और मुखरित हुई। केवल 12 वर्ष की आयु में ब्रजभाषा में उन्होने ‘कनकलता’ नाम से कविता लिखना शुरू किया। उन्होने ‘रसिकेन्द्र’ नाम से ब्रजभाषा में कई कविताएं, दोहा, चौपाई, छप्पय आदि छंद भी लिखा। ये रचनाएँ 1904-5 के बीच कई पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए। बाद में उनका संपर्क आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी से हुआ। उनकी प्रेरणा से ही उन्होने खड़ी बोली यानि हिन्दी में लिखना शुरू किया। उनकी हिन्दी कविताएं प्रतिष्ठित पत्रिका ‘सरस्वती’ में प्रकाशित होना शुरू हुआ। ‘सरस्वती’ के संपादक महावीर प्रसाद द्विवेदी ही थे।
उनका पहला काव्य संग्रह था ‘रंग में भंग’ और दूसरा ‘जयद्रथ वध’। ‘जयद्रथ वध’ से उन्हें पहचान मिलने लगी। लेकिन उनकी सबसे प्रसिद्ध रचना आई 1912-13 में। नाम था ‘भारत-भारती’। इसका मूल स्वर राष्ट्रवाद का था। इसके बाद लिखना शुरू किया ‘साकेत’। यह शुरू तो हुआ 1916-17 में लेकिन प्रकाशित हुआ 1931 में।
अपने पैतृक गाँव चिरगांव में 1911 में उन्होने ‘साहित्य सदन’ नाम से अपने स्वयं का प्रेस स्थापित किया। 1954-55 में उन्होने झाँसी में ‘मानस मुद्रण’ की स्थापना भी किया। साकेत, पंचवटी आदि अन्य कई ग्रंथ उनके अपने ही प्रेस से प्रकाशित हुआ।
1931 में वे गांधी जी के संपर्क में आए। इसके बाद वे सक्रिय रूप से आजादी के आंदोलन में भाग लेने लगे। 1941 में गांधी जी के व्यक्तिगत सत्याग्रह में भाग लेने के कारण उन्हें सात महीने जेल में रहना पड़ा।
हृदय आघात से 78 वर्ष की आयु में 12 दिसंबर 1964 को उनकी मृत्यु हो गई।
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