4 मार्च, 1932 को दक्षिण अफ्रीका के जोहन्स्बर्ग में एक बच्ची का जन्म मेडिकल परेशानियों के बावजूद हुआ। लेकिन जब वह मात्र 18 दिन की थी तभी उसकी माँ को एक अवैध बियर बेचने के जुर्म में गिरफ्तार कर 6 महीने की कैद की सजा दी गई क्योंकि परिवार जुर्माने की रकम नहीं दे पाया। माँ के साथ वह बच्ची भी 6 महीने तक जेल में ही पली बढ़ी। परिवार आर्थिक तंगी में था। लेकिन पिता किसी तरह एक शिक्षक का काम कर यह बड़ा परिवार संभाल रहे थे जिसमें माँ के पहले पति से उत्पन्न पाँच भाई-बहन भी शामिल थे। लेकिन जब वह 6 वर्ष की हुई उसके पिता का निधन हो गया। उनकी माँ जो कि एक घरेलू महिला थी, के लिए परिवार संभालना मुश्किल हो गया। अतः वह बच्चों के साथ प्रिटोरिया शहर के पास अपनी माँ के पास चली गयी।
इस बच्ची का नाम था जेंजेली मिरियम माकेबा जो कि आगे चल कर ‘मामा अफ्रीका’ के नाम से भी जानी गई और गीतकार, अभिनेत्री, एफ़्रोपॉप एवं जैज संगीत शैली की गायिक, तथा मानव अधिकार और रंगभेद आंदोलन के एक प्रमुख आवाज बनी। उसके पिता थे कैसवेल जो दक्षिण अफ्रीका के अश्वेत जनजाति जोसा (खोसा) समुदाय से थे। माँ का नाम था क्रिस्टीना मकेबा जो एक अन्य जनजाति स्वाज़ी समुदाय से आती थी। उनका पैतृक निवास स्थान स्वाज़ीलैंड था।
पिता के निधन के बाद अपनी नानी के पास ही मकेबा अपने सौतेले और चचेरे भाई बहनों के साथ पलने लगी। यहीं अपने परिवार और आसपास प्रचलित परंपरागत वाद्य और लोकगीतों में उसकी रुचि बढ़ने लगी। उस समय श्वेत लोगों के संगीत को ही अधिक मान्यता मिलती थी और अश्वेतों की कला एवं संस्कृति को हीन भाव से देखा जाता था।
मकेबा ने अपने स्कूल के कार्यक्रमों में शौकिया तौर पर गाना शुरू किया। जल्दी ही वह शहर के एक संगीत मंडली में शामिल हो गई। मकेबा और उसके दो भाई केवल एक तरह के संगीत में ही रुचि नहीं रखते थे बल्कि अपने देश, समस्त अफ्रीका महाद्वीप और दुनिया भर में लोकप्रिय परंपरागत एवं आधुनिक संगीत को जानने का प्रयास करते। वे लोग विभिन्न गायकों एवं संगीतकारों के रिकॉर्ड को एकत्र करते थे।
मकेबा की संगीत में रुचि बढ़ती गई। लेकिन अपने परिवार का पालन-पोषण करने के लिए उसे अपनी पढ़ाई छोडनी पड़ी। कुछ दिनों के लिए उसकी माँ चिकित्सा सेवा की पढ़ाई करने अपने मूल देश स्वाज़ीलैंड चली गई। अब उसे आया, धोबी जैसे छोटे-मोटे काम करने पड़े। इसी बीच 17 वर्ष की उम्र में 1949 में उन्होने एक प्रशिक्षणरत पुलिसकर्मी से शादी कर ली। अगले साल ही वह एक बच्ची की माँ भी बन गई। इस बच्ची का नाम था बोंगी। लेकिन इसके कुछ दिनों बाद ही उन्हें कैंसर का पता चला। जैसे इतनी भी मुसीबत पर्याप्त नहीं थी। कहा जाता है कि पति उसे मारता-पीटता भी था। बीमारी की हालत में ही वह शादी के 2 साल बाद ही उसे छोटे से बच्चे और बीमार शरीर के साथ छोड़ कर चला गया। इस बीमारी से पूर्ण रूप से निजात पाने में उसे दस वर्षों का लंबा समय लग गया।
बीमार रहते हुए ही मकेबा ने व्यवसाय के रूप में संगीत अपनाने का निर्णय लिया। चूंकि इसमें आय की कोई निश्चितता नहीं थी इसलिए पहले तो घर वालों ने रोका लेकिन बाद में समर्थन दिया। पेशेवर गायक के रूप में वह जिस पहले बैंड से जुड़ी उसका नाम था ‘क्यूबन ब्रदर्स’। मकेबा को छोड़ कर इसके सभी सदस्य पुरुष थे और लोकप्रिय अमेरिकी गीतों को गाते थे। 21 वर्ष की उम्र में वह मैनहट्टन बैंड’ में शामिल हो गई। उसने अफ्रीकी और अमेरिकी गीतों की मिलीजुली शैली विकसित कर लिया। धीरे-धीरे उसके इस मिश्रित संगीत की लोकप्रियता बढ़ी और यह अफ्रीका से बाहर निकल कर अमेरिका और अन्य देशों तक भी पहुँचने लगा।
मकेबा का यह प्रयोग एक ट्रेंडसेटर बन गया। अफ्रीकी कला, संस्कृति और संगीत में वहाँ के लोगों का विश्वास बढ़ने लगा। 1955 में उसकी मुलाक़ात नेल्सन मंडेला से हुई। मंडेला उस समय एक युवा वकील थे जो अश्वेत लोगों के अधिकारों के लिए प्रयासरत थे। वे मकेबा की प्रतिभा से प्रभावित हुए।

1959 में मकेबा ने दक्षिण अफ्रीकी जैज ओपेरा ‘किंग काँग’ में अभिनय किया। जैज वैसे तो अश्वेत लोग का संगीत माना जाता था लेकिन इस ओपेरा का प्रदर्शन दोनों तरह के दर्शकों को ध्यान में रख कर किया गया था। इसके कलाकारों में एक श्वेत संगीतकार भी थे। इससे श्वेत लोगों में भी उनकी पहचान बनने लगी थी। इसी साल एक रंगभेद विरोधी फिल्म ‘कमबैक’ में उन्होने एक छोटी लेकिन दमदार भूमिका निभाया। इस फिल्म को वेनिस फिल्म फेस्टिवल में प्रतिष्ठित क्रिटिक्स चॉइस अवार्ड मिला। अब उन्हें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलने लगी। अपने शो के लिए वह लंदन और अमरीका की यात्रा पर जाने लगी। लंदन में एक अमरीकी गायक हैरी बेलफोनेट से उसकी मुलाक़ात हुई जिसे बाद में उन्होने अपना गुरु माना। इन दोनों कलाकारों के ‘पाटा पाटा’ गीत ने अभूतपूर्व लोकप्रियता पाया। बाद में इसके कई संस्करण निकले।
इंग्लैंड में ही उसने भारतीय मूल के एक दक्षिण अफ्रीकी गायक सन्नी पिल्लै से शादी कर लिया। लेकिन इसके तुरंत बाद वह न्यूयार्क चली गई। अमरीका में उनके गीतों और शो की लोकप्रियता बढ़ने लगी।
यहाँ तक तो लगता है अब मकेबा की जिंदगी में सब कुछ अच्छा ही अच्छा था। लेकिन नहीं। संघर्ष अभी भी था। केवल संघर्ष का दायरा बड़ा हो गया। अगले ही वर्ष यानि 1960 में श्वेत शासित दक्षिण अफ्रीका में शार्पविले नरसंहार हुआ। अश्वेतों के एक बड़ी भीड़ पुलिस स्टेशन के सामने प्रदर्शन कर रही थी। पुलिस ने गोली चला दी जिसमें 69 अश्वेत मारे गए। मरने वालों में मकेबा के दो चाचा भी थे। इसी समय उनकी माँ का भी निधन हो गया। जब वह माँ के अंतिम संस्कार के लिए स्वदेश लौटने लगी तो पता चला कि दक्षिण अफ्रीका की श्वेत सरकार ने उसका वीजा रद्द कर 1990 तक के लिए निर्वासित कर दिया था। कारण था कि वह देश के बाहर राजनीतिक और रंगभेद विरोधी संगीत गाती थी। उसका सारा परिवार, जिसमें उसकी अपनी नौ वर्षीय बेटी भी शामिल थी, दक्षिण अफ्रीका में ही रह रहा था। उसे अपने परिवार के सुरक्षा की चिंता होने लगी।
अब वह अमरीका में ही रह गई। तक मकेबा सरकार के खिलाफ खुल कर कुछ बोलने से बच रही थी लेकिन अब वह खुल कर आलोचना करने लगी। अश्वेत के अधिकारों के लिए कार्य करने वाले और समान विचार रखने वाले लोगों और कलाकारों से मिलने लगी। इन मानसिक तनाव के बावजूद इस समय अमरीका में संगीत का उनका करियर अच्छा चल रहा था। टाइम, न्यूज वीक जैसे पत्र पत्रिका उसकी तारीफ कर रहे थे। यहीं उसने तीसरी शादी एक अफ्रीकी निर्वासित हयुग मासेकेला से की।
अमरीका ही नहीं बल्कि यूरोप, इजरायल, लैटिन अमरीका और अन्य अफ्रीकी देशों में भी वह कार्यक्रम और यात्राएं करने लगी। रंगभेदी आंदोलन को वह खुले रूप से समर्थन देने लगी। 1962 में अफ्रीकी देश केन्या के आजादी के संघर्ष के लिए धन जुटाया। संयुक्त राष्ट्र की विशेष समिति में रंगभेद के विरुद्ध गवाही दी। अपने देश दक्षिण अफ्रीका के नेशनल पार्टी सरकार के खिलाफ आर्थिक और हथियारों के प्रतिबंधों की मांग की।
दक्षिण अफ्रीकी सरकार ने इसके प्रतिक्रिया स्वरूप उसके संगीत पर प्रतिबंध लगा दिया और उसे नागरिकता से वंचित कर दिया। अब उनके पास कोई देश नहीं रहा। लेकिन जैसे जैसे विरोध बढ़ता गया, समर्थन भी बढ़ने लगा। अल्जीरिया, घाना, गिनी, बेल्जियम आदि नौ देशों ने उन्हें अपने देश के पासपोर्ट दिए और दस देशों ने मानद नागरिकता। पश्चिम के उदारवादियों का ध्यान भी उसकी तरफ गया। मानवाधिकार आंदोलनकारियों ने रंगभेद को मानवाधिकार से जोड़ कर उसका समर्थन किया। दुनिया भर के रंगभेद विरोधी और मानवाधिकार समर्थक आंदोलनों से वह जुडने लगी। वह इनके लिए प्रचार और धन जुटाने का कार्य करती थी। अपने नए मिश्रण शैली के संगीत को उसने इसका माध्यम बनाया।

1966 में उन्हें ‘एन एवनिंग विद बेलफोनेट/मेकाबा’ के लिए सर्वश्रेष्ठ लोक रिकॉर्डिंग का ग्रैमी अवार्ड मिला। इस एल्बम में भी अश्वेत लोगों की दुर्दशा और रंगभेद विरोध की बाते थी। मेकाबा और बेल्फ़ोनेट की पार्टनरशिप वाली एल्बम लोगों में बहुत पसंद की जाती थी और ‘पाटा पाटा’ तो दुनिया भर में मशहूर हो चुका था। लेकिन बाद में कुछ मतभेद के कारण इन दोनों की दोस्ती टूट गई।
इसी बीच 1968 में उन्होने गिनी के रंगभेद विरोधी उग्र आंदोलनकारी कारमाइकल से शादी कर ली। इस शादी और बेल्फ़ोनेट से दूरी के कारण अमरीका, विशेष कर श्वेत अमरीकियों में उसकी लोकप्रियता गिरने लगी। कुछ उदारवादी भी उसे चरमपंथी और उग्रवादी मान कर दूर होने लगे। पत्र-पत्रिकाओं ने उनकी खबर छापना कम कर दिया। अमरीका की केन्द्रीय खुफिया एजेंसी (सीआईए) ने उनका पीछा करना शुरू कर दिया। दरअसल इस समय अमरीका भी व्यवहारिक रूप से रंगभेद आंदोलन से डरा हुआ था क्योंकि उसके यहाँ भी अश्वेत अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे थे।
इसी बीच मकेबा अपने पति कारमाइकल के साथ बहामास यात्रा पर गई। लेकिन जब लौटने लगी तब अमरीका ने वीजा देने से मना कर दिया। अमरीका के भी दरवाजे बंद होने के बाद वे दोनों गिनी चले गए। यहाँ सुरक्षा के लिए कारमाइकल ने अपना नाम बदल कर क्वामे टूर रख लिया। 15 वर्ष तक दंपत्ति गिनी में ही रहा। यहाँ इनके संबंध गिनी के राष्ट्रपति अहमद सेको टुरे और घाना के अपदस्थ राष्ट्रपति क्वामे नक्रमा से अच्छे हो गए। राष्ट्रपति टुरे अफ्रीकी संगीत की एक नई शैली बनाना चाहते थे जिसके लिए उन्होने अपना एक रिकॉर्ड लेबल सिलिफोन नाम से बनाया था। मकेबा इसमें सहयोग देने लगी हालांकि यहाँ कलाकारों को पैसे बहुत कम मिलते थे। यहाँ भी उसने क्रांतिकारी गीत लिखना और संगीत के प्रयोग करना जारी रखा जिसमें कुछ गीत क्रांतिकारियों के बीच बहुत लोकप्रिय हुए। परिणाम यह हुआ कि जो-जो अफ्रीकी देश स्वतंत्र होते जाते वहाँ मकेबा को गाने के लिए आमंत्रण मिलता था। उनके योगदान के कारण उन्हें घाना का राजनयिक और संयुक्त राष्ट्र में गिनी का आधिकारिक प्रतिनिधि भी बनाया गया।
इस तरह वह भले ही अपने देश दक्षिण अफ्रीका से निकाल दी गई लेकिन समस्त अफ्रीका के अश्वेत आकांक्षा और आशा की प्रतीक बन गई। यूरोप और एशिया के देशों की यात्रा कर वह अश्वेत अधिकारों की तरफ दुनिया का ध्यान दिलाती रही। अनेक देशों में उनके गीतों को प्रतिबंधित किया गया लेकिन क्रांतिकारियों और आम अश्वेत जनता में उनकी लोकप्रियत बढ़ती ही गई।
जब मकेबा अपने देश से निकली थी तब अपनी बेटी को देश में ही छोड़ कर आई थी लेकिन बाद में वह आकर माँ से मिल गई। वह भी एक अच्छी गायिका थी। कई बार उसने अपनी माँ के स्टेज से गीत गाए थे। लेकिन 1985 में प्रसव के दौरान उसकी मृत्यु हो गई। अब उसके दो बच्चों की ज़िम्मेदारी भी नानी मकेबा पर ही आ गयी। इसी बीच गिनी में तख्तापलट हो गया और उसके समर्थक राष्ट्रपति टुरे की मृत्यु हो गई। नई सरकार से उसके अच्छे संबंध नहीं रह गए थे। ऐसे में अब सुरक्षा के लिए गिनी छोडना जरूरी हो गया। अब उनका अगला ठिकाना बना बेल्जियम।
बेल्जियम में भी उन्होने संगीत के माध्यम से अपना कार्य जारी रखा। यहाँ ग्रेसलैंड टूर नामक संगीत टूर के दौरान दक्षिण अफ्रीका के सांस्कृतिक बहिष्कार के उल्लंघन के लिए विवाद हुए। इसी टूर के दौरान उनके पैर में फ्रेक्चर भी हो गया।
पर अलग-अलग संस्कृतियों के लोगों के साथ मिल कर अश्वेतों की पीड़ा को दुनिया के सामने संगीत और कला के माध्यम से रखने का प्रयास जारी रहा। अपनी आत्मकथा ‘मेकबा: माई स्टोरी’ में भी रंगभेद के उनके अनुभवों के बारे आलोचनात्मक रूप से लिखा था।
इधर 1990 में दक्षिण अफ्रीका रंगभेदी क़ानूनों से मुक्त हुआ। आंदोलन के नेता नेल्सन मंडेला को 27 वर्षों बाद जेल से रिहा कर दिया गया। उनके प्रयासों से फ्रांसीसी पासपोर्ट का उपयोग कर मकेबा को 6 दिन के लिए दक्षिण अफ्रीका का वीजा मिला। इस संक्षिप्त यात्रा का उपयोग उन्होने बैठकों, साक्षात्कार और गायन में किया। उनके देश आगमन से लोगों में बहुत अधिक मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ा।
बाद में वे फिर अपने देश दक्षिण अफ्रीका आई। अभिनय और संगीत के साथ-साथ रंगभेद विरोध, अनाथ एवं विकलांग बच्चों, एचआईवी पीड़ित बच्चों आदि के भी वे काम करती रही और विभिन्न पदों पर रही। अपने पोतो-पोतियों को पालने की ज़िम्मेदारी भी निभाती रही। ऑस्टिओआर्थेराइटिस के कारण उनका स्वाथ्य बिगड़ता जा रहा था लेकिन फिर भी जीवन के अंतिम समय तक काम करती रही।
9 नवंबर 2008 को इटली में एक संगीत कार्यक्रम के दौरान उन्हें हार्ट अटैक आया और वहीं उनकी मृत्यु हो गई। इस समय वह अपनी सबसे लोकप्रिय गीत ‘पाटा पाटा’ ही गा रही थी। यह कार्यक्रम भी उस क्षेत्र में सक्रिय आपराधिक संगठन कैमोरा के खिलाफ जागरूकता के लिए था।
अपनी जीवन काल में मकेबा ने 30 से अधिक एल्बम, 2 आत्मकथा और सैकड़ों कार्यक्रम किया। कला कैसे समाज ही नहीं राजनीति को भी बदल सकता है, इस बात को उन्होने साबित कर दिखाया। उनके कला और विचारों की विशेष बात यह थी कि यह किसी देश या समूह से जुड़ा नहीं था। जहां कहीं भी अन्याय और शोषण है, वहाँ मकेबा का संगीत उपस्थित है। कलात्मक प्रतिभा का सार्थक और सार्वभौम उपयोग उन्हें अन्य कलाकारों से अलग बनाता है।
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