पर्व आते हैं, चले जाते हैं

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“पर्व आते हैं, चले जाते हैं;

रस कहाँ हृदय में, पैसे कहाँ जेब में;

ताकि मैं उसका स्वागत करूँ!”

बहुतों के लिए पर्व आने से हृदय में रस नहीं बल्कि डर और खालीपन आता है। डर… खर्चे का, डर… अपनी बेबसी का, डर… अपने अकेलेपन का, डर…. अपनी पहचान खोने का, और अब… डर झगड़े और दंगे का भी।

जब मैं बालकनी में खड़े किसी बच्चे को नीचे जाते अनजाने राहगीरों पर गुब्बारे से पानी या रंग फेंकते हुए देखती हूँ तो सोचती हूँ कितना अभागा है ये बच्चा जिसे कोई यह बताने वाला भी नहीं है कि इससे किसी दूसरे को पीड़ा हो सकती है। दूसरे को पीड़ा देकर कभी खुश नहीं हुआ जाता।

जब मैं भांग और शराब के नशे में मस्त किसी को देखती हूँ तो सोचती हूँ कितना अभागा है, इसे तो गोपियों के आत्मिक प्रेम की मस्ती का अनुमान भी नहीं है, नशे में मस्ती ढूंढ रहा है बेचारा।     

फ्लैट या केबिन रूपी घोंसलों में कैद व्यक्ति को क्या पता कि फाल्गुन की बयार में सर्दी में सोयी प्रकृति कितनी खूबसूरत और खुश हो जाती है। हृदय में यह उमंग एवं रंग तो नव जीवन का होता है, पुनर्निर्माण का होता है। पर जब मन खाली हो तब तन पर रंग का क्या असर होगा।

‘पैकेज’ देख कर प्रेम करने लोग प्रह्लाद और गोपियों के प्रेम को कैसे समझ पाएंगे। एक छोटे से बच्चे के प्रेम एवं विश्वास ने परमात्मा को झुका दिया, एक बच्चे के प्रेम के आगे एक सम्राट की शक्ति हार गई, गोपियों के प्रेम ने ईश्वर को उनका ऋणी बना दिया। वे कैसे समझेंगे कि प्रेम जबर्दस्ती रंग लगाने से नहीं होता।

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बाजार से गुजिया खरीद कर खाने वाली पीढ़ी कैसे यह विश्वास कर पाएगी कि कभी घर में पकवान बना कर सबसे पहले समाज के उन लोगों को दिया जाता था जिनसे हमें हमारे कामों में सहायता मिलती थी, जैसे नाई, धोबी, माली, सेवक, आदि। जब पड़ोस में कोई भूखा हो तब तक आपके पर्व का कोई महत्व नहीं है। 

ऐसा कैसे हो गया कि विशुद्ध प्रेम को परिभाषित करने वाले पर्व में लोग घर से बाहर निकलने में डरने लगे, हॉस्पिटल में दुर्घटनाग्रस्त लोगों के लिए विशेष इंतजाम किया जाने लगा, प्रशासन को दंगाइयों और हुड़दंगियों से निपटने के लिए विशेष तैयारी करनी पड़ी?

हम आने वाली पीढ़ियों को क्या बताएँगे- होली नशा एवं हुड़दंग करने का पर्व है, दूसरों को पीड़ा पहुंचाने का पर्व है या फिर प्रकृति से सामंजस्य एवं सबके लिए निस्वार्थ प्रेम का पर्व है? दिवाली जुए एवं गिफ्ट का त्योहार है या फिर अच्छाई और बुराई में अंतर को समझाने का?

हर पर्व-त्योहार के साथ कोई-न-कोई कहानी जुड़ी हुई होती है। कुछ परम्पराएँ जुड़ी हुई होती हैं। ये कहानियाँ और परम्पराएँ हमारे सामाजिक और मानवीय मूल्यों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम होती है। यह हम पर निर्भर करता है कि हम अपनी अगली पीढ़ी को क्या पहुंचाएँ।