एक बहुत ही प्रसिद्ध और मजेदार कहानी है। एक नवविवाहित जोड़ा विवाह के बाद नए घर में आया। पत्नी ने खिड़की से देखा कि पड़ोस की महिला अपने घर के बाहर धुले हुए कपड़ों को सूखा रही है। उसे लगा उसकी पड़ोसन महिला को कपड़े ठीक से साफ करने नहीं आता है। वह अपने पति से पड़ोसन का मज़ाक बनाते हुए बोली ‘देखो उसने कितने गंदे कपड़े सूखने के लिए डाला है। उसे कपड़े साफ करने नहीं आता है।’ अगले दिन भी ऐसा ही रहा। रोज जब पड़ोसन कपड़े सुखाने आती तो वह नव विवाहिता स्त्री उसके कपड़ों को देख कर ताने मारती।
इसी तरह लगभग एक महिना बीत गया। एक दिन जब वह स्त्री सुबह उठी तो देखि आज उसके पड़ोसी के कपड़े बिलकुल साफ थे। उसने अपने पति से कहा ‘देखो लगता है हमारी पड़ोसन ने इतने दिनों बाद कपड़े साफ करना सीख ही लिया। आज उसके कपड़े साफ हैं।’
यह सुन कर पति ने कहा ‘आज मेरी नींद जल्दी खुल गई थी तो मैंने से सोचा खिड़की के शीशे साफ कर दूँ। आज साफ शीशे से देख रही हो इसलिए कपड़े ज्यादा साफ लग रहे हैं।’
अब उस स्त्री को समझ में आया कि गंदे पड़ोसन के कपड़े नहीं बल्कि उसके अपनी खिड़की के शीशे थे।
कई बार ऐसा होता है कि हम अपनी कमी को नहीं देख पाते और दूसरों में कमियाँ निकलते रहते हैं। इसलिए दूसरों की आलोचना या विश्लेषण करने से पहले एक बार जरूर देख लेना चाहिए कि कहीं मेरी खिड़की यानि दृष्टि ही तो दूषित नहीं है।
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