इंडिया टुडे और लल्लन टॉप ने 20 दिसंबर 2025 को दिल्ली के कान्स्टीट्यूशन क्लब में प्रसिद्ध लेखक जावेद अख्तर और इस्लामिक विद्वान मौलाना मुफ़्ती शमाइल नदवी के बीच एक डिबेट करवाया। विषय था ‘Does God exist’ यानि क्या ईश्वर का अस्तित्व है। यह डिबेट आजकल बड़ी चर्चा में है। मेरे विचार से दोनों वक्ताओं ने बहुत ही गरिमा, स्पष्टता और विद्वता के साथ अपने तर्क रखें। एक दो पॉइंट्स पर दोनों ही थोड़े कमजोर दिखे। पर इसका कारण यह था कि दोनों की तकनीक अलग थी। मुफ्ती साहब का मुख्य तर्क यह था कि ईश्वर हमारी तरह फिजिकल existence नहीं रखता इसलिए उसे तर्क से ही समझा जा सकता है। उन्होंने जो सबसे बेसिक तर्क दिया वह था ”contingent fallacy’ यानि जो चीजें (प्रकृति) एक दूसरे पर डिपेंडेंट है, उनका अपना इंडिपेंडेंट एक्जिटेंस नहीं हो सकता। अनंत में जाकर कोई न कोई ऐसी एंटिटी होनी चाहिए जो इंडिपेंडेंट हो, वहीं गॉड है। जावेद साहब के प्रश्न को वे बड़ी चालाकी से यह कह कर टाल जाते कि यह ईश्वर से नहीं बल्कि मजहब से संबंधित है।

वह बार-बार contingency वाले तर्क पर जावेद जी से रिप्लाई मांग रहे थे। दूसरी तरफ जावेद साहब व्यावहारिक आधार पर अपने तर्क रख रहे थे। वे चूंकि फिलोसॉफी के एक्सपर्ट नहीं हैं इसलिए contingency को ठीक से नहीं काउंटर कर सके। Contingency fallacy सिद्धान्त की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि यह मान कर चलता है कि यह क्रम एक सीधी लाइन में चलती है। जबकि जैन और बौद्ध दर्शन इसे एक वृत्त मान कर इसके मूल को ही खंडित कर चुके हैं। इसे वृत्त मान कर ये दोनों दर्शन ईश्वर के बिना भी कर्म फल, पुनर्जन्म और आत्मा को तर्क के आधार पर सिद्ध करते हैं। लेकिन जावेद साहब यहां थोड़े कमजोर पड़े, अन्य मामले में उनके तर्क बहुत ही सटीक रहे।
पर मेरा ध्यान तर्क से ज्यादा प्रश्न ने खींचा। ‘क्या ईश्वर है?’ मेरी नजर में यह प्रश्न बहुत अहमियत नहीं रखता।
अगर दुनिया के अलग अलग हिस्सों में किसी-न-किसी तरह का धर्म और ईश्वर हैं तो यह न तो साजिश हो सकता है न ही गलती। बल्कि यह संकेत है कि यह हमारे मौलिक मानवीय भावनाओं से प्रेरित है। हम माने या न माने, भले ही हम सब की नहीं हो, पर हम में से अधिकांश को ईश्वर की जरूरत है।
इसलिए सवाल यह होना चाहिए कि ईश्वर हमें क्यों चाहिए? मेरे लिए ईश्वर क्या है? क्योंकि ईश्वर और धर्म की प्रत्येक व्यक्ति की व्याख्या अपनी-अपनी होती है।
