कैलाश के 8 अनसुलझे रहस्य-कैलाश पर्वत: भाग 1

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क्या पृथ्वी पर कोई ऐसा स्थान है जहां जाने से आपकी आयु एक दिन में एक महीने बढ़ जाए? जहां आपके नाखून और बाल चार गुना तेजी से बढ़ने लगे? क्या कोई पर्वत मानव निर्मित हो सकता है? क्या कोई पर्वत खोखला हो सकता है? कोई पर्वत ऐसा हो सकता है जिसके ऊपर पंछी तो उड़ सके लेकिन प्लेन नहीं उड़ सके?

ऐसी अनेक ही बातें जुड़ी हुई हैं कैलाश पर्वत के साथ। यह पर्वत चार धर्म के अनुयायियों द्वारा बहुत ही पवित्र माना जाता है। लेकिन अपनी पवित्रता के कारण जितना यह आकर्षण का केंद्र है उससे अधिक अपने रहस्यों के कारण दुनिया भर के वैज्ञानिकों, पर्वतारोहियों, पर पुरानी सभ्यताओं में रुचि रखने वालों के बीच लोकप्रिय है। इन रहस्यों को कुछ पर्वतारोहियों के किताबों में उनके दावों से बल मिला। लेकिन अभी तक इस दिशा में हुई खोजों ने रहस्यों को सुलझाने के बदले उलझा दिया है। वास्तव में हर अन्वेषण उत्तर देने के बजाय प्रश्न ही उत्पन्न कर रहा है। तो क्या हैं कैलाश पर्वत के रहस्य? इसके धार्मिक, आध्यात्मिक और वैज्ञानिक सभी पहलुओं पर आज बात करेंगे।

Table of Contents

कैलाश का नाम और अर्थ

इस पर्वत का नाम संस्कृत में ‘कैलाश’ है जिसे बोलचाल में ‘कैलास’ कह देते हैं। ऐसा माना जाता है यह ‘केलास’ शब्द से निकला है जिसका अर्थ होता है क्रिस्टल। इसका एक अर्थ ‘शांत स्थान’ से भी लगाया जाता है। तिब्बती बुद्ध इसे कांगरी रिनपोचे कहते हैं जिसका अर्थ होता है ‘मूल्यवान हिम पर्वत (presious snow mountain’। इसके लिए विभिन्न भाषाओं में अनेक शब्द आए हैं जिनके अर्थ होते हैं ‘पानी के फूल (water’s flower) समुद्री जल का पहाड़ (mountain of sea water), नौ स्वस्तिक का पहाड़ आदि। इन नामों से इस पर्वत की विशेषताओं का पता चलता है। लेकिन हम इसे कैलाश ही कहेंगे।

कैलाश के आसपास इसके बराबर या बड़ा कोई अन्य शिखर नहीं है। इससे यह एकांत में बसा हुआ शांत शिखर लगता है। आसपास के छोटे शिखरों की तुलना इसके कमल आसन से की गई है। 

ब्रह्मपुत्र, सतलज जैसी बड़ी नदियों का उद्गम कैलाश पर्वत से ही हुआ है। इस शिखर की ऊंचाई 6,638 मीटर यानि 21,778 फुट है।

यह कहाँ है?

कैलाश पर्वत चीन के राजनीतिक नियंत्रण में आने वाले स्वायत्त प्रदेश तिब्बत में स्थित है। यह समस्त क्षेत्र हिमालय पर्वत श्रेणी का ही भाग है जो की तिब्बत के दक्षिण-पश्चिम कोने पर स्थित है। यह ल्हा चू और झोंग जू पर्वत के बीच फैला है। कैलाश पर्वत के उत्तरी शिखर का नाम कैलाश शिखर है। यह शिखर विशाल शिव लिंग या पिरामिड की तरह दिखता है। इस शिखर के चारों ओर 16 इससे छोटे-छोटे शिखर हैं। इस कारण ग्रन्थों में इसे 16 कमल दलों के बीच स्थित बताया गया है। शिखर का अधिकांश भाग हमेशा बर्फ से ढंका रहता है। हाँ गर्मी के बर्फ की मात्रा कुछ भागों में कम जरूर हो जाती है।

शिखर के नीचे दो सरोवर हैं- मानसरोवर और राक्षस ताल। सरोवर और शिखर सहित इस क्षेत्र को मानस खंड कहते हैं। विभिन्न ग्रन्थों में इसके लिए अष्टापद, गण पर्वत और रजतगिरि शब्द भी आया है। ऐसा माना जाता है की पुराणों में वर्णित मेरु पर्वत कैलाश पर्वत ही

तीर्थयात्री मानसरोवर तक ही जाते हैं। इससे आगे कैलाश शिखर पर चढ़ने की अनुमति किसी को नहीं है। अनुमति क्यों नहीं है, इस पर हम आगे बात करेंगे।

धार्मिक आध्यात्मिक महत्व

कैलाश पर्वत के रहस्यों की बात करने से पहले इसके धार्मिक आध्यात्मिक महत्व की बात कर लेते हैं। हिन्दू, बौद्ध, जैन और बॉन- इन चारों धर्मों में इसे अत्यंत पवित्र क्षेत्र माना गया है।

हिन्दू धर्म के अनुसार यह भगवान शिव का निवास स्थान होने के कारण अत्यंत पवित्र है। माना जाता है कि भगवान शिव यहाँ देवी पार्वती के साथ ध्यान करते हैं। महाभारत में अनेक ऋषि मुनियों के यहाँ रहने और अर्जुन के यहाँ आने का वृतांत मिलता है। पांडव अपनी पत्नी द्रौपदी के साथ हिमालय के मानसखंड क्षेत्र में ही शरीर का अंत करने गए थे।  

पहले जैन तीर्थंकर ऋषभदेव ने यहाँ निर्वाण प्राप्त किया था। उनके पुत्र भरत स्वामी ने दिग्विजय के समय इस पर भी विजय प्राप्त किया और रत्नों के 72 जिनालय बनवाया था। 24वें एवं अंतिम जैन तीर्थंकर महावीर को इन्द्र उनके जन्म के बाद यहाँ लाए थे। इसलिए जैन धर्म में इसे पवित्र माना जाता है। जैन धर्म के अनुयायी कैलाश को अष्टापद कहते हैं।

बौद्ध और तिब्बत के स्थानीय बॉन धर्म में भी मेरु यानि कि कैलाश पर्वत का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। बौद्ध ग्रन्थों के अनुसार कैलाश और मानसरोवर विश्व के पिता और माता हैं। बौद्ध धर्म के तांत्रिक मत के संस्थापक पद्मसंभव से संबन्धित अनेक स्थान इस क्षेत्र में हैं। वज्रयान मत के महान तिब्बती संत मिलारेपा (1052-1135 ई) की साधना का स्थल यही क्षेत्र है।

तिब्बती बौद्धों का मानना ​​है कि परम आनन्द के प्रतीक बुद्ध डेमचोक (धर्मपाल) कैलाश पर्वत के अधिष्ठाता देव हैं। वह कैलास पर निवास के करते हैं। बॉन मतावलंबी कैलाश को अपने आकाश देवी का रूप मानते हैं। वह भी मानते हैं कि यह संसार का केंद्र है।

धर्मग्रन्थों में कैलाश को मेरु पर्वत के रूप में उल्लेखित किया गया है। इसे पृथ्वी और स्वर्ग के बीच का मार्ग कहा गया है। विष्णु पुराण में इसे पृथ्वी का केंद्र कहा गया है जो कमल की तरह अन्य पर्वत शिखरों से घिरा हुआ है। कहते हैं कि रावण यहीं से सीढ़ी बनाना चाहता था स्वर्ग जाने के लिए।

मिलरेपा अभी तक के एकमात्र व्यक्ति माने जाते हैं जो कैलाश शिखर पर चढ़ सके हैं।

कैलाश की परिक्रमा  

सभी धर्मों में कैलाश की परिक्रमा का विशेष महत्व है। यह परिक्रमा तारचेन से आरंभ होकर वहीं समाप्त होती है। परिक्रमा पथ में मंधाता पर्वत स्थित गुर्लला पास, मानसरोवर, राक्षसताल, तीर्थपुरी, डोलमाला इत्यादि आते हैं। तीर्थपुरी में गर्म पानी के झरने हैं जिसके आसपास चूनखड़ी के टीले हैं। माना जाता है भस्मासुर ने यहीं तप किया था और यहीं वह भस्म हुआ था। इसी रास्ते में मणि पत्थर मिलते हैं। यह समस्त मार्ग अत्यंत सुंदर प्रकृतिक दृश्यों से भरपूर है। मार्ग में अनेक और बौद्ध स्तूप एवं मठ भी मिलते हैं हालांकि इनमें से अनेक 1966 से 1976 तक चलने वाले चीन के ‘सांस्कृतिक क्रांति’ के दौरान नष्ट कर दिए गए हैं। इसी प्रदेश में एक सुगंधित पौधा मिलता है जिसे कैलाश धूप कहते हैं। यहाँ से प्रसाद के रूप में लोग उसे ही लाते हैं। परिक्रमा मार्ग में कहीं भी कैलाश शिखर पर पैर रखना या चढ़ने की कोशिश करना धर्म विररुद्ध माना जाता है और चीन के कानून के अनुसार मना है।

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मानसरोवर तीर्थयात्रा और परिक्रमा बहुत पुराने समय से चला आ रहा था। लेकिन 1930 के आसपास इसे रोक दिया गया जबकि ब्रिटिश सरकार और चीन सरकार दोनों ही तिब्बत पर अपना अपना दावा करने लगे। 1950-51 में चीन ने तिब्बत पर कब्जा कर लिया। इसके बाद तीर्थयात्रा की अनुमति दे दी गई। लेकिन भारतीयों को यह अनुमति 1954 के भारत-चीन समझौते से मिला। पर यह बहुत दिनों तक नहीं रह सका। 1959 में तिब्बत विद्रोह और 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद सीमा बंद कर दिया गया। 1981 के समझौते के बाद यात्रा फिर से शुरू हुई जो कि कोविड के समय को छोड़ कर अभी तक लगातार चल रही है। यात्रा अभी दो रस्तों से होता है उत्तराखंड के लीपु लेख दर्रे से और सिक्किम के नाथु ला दर्रे से। नाथु ला मार्ग 2015 से खुला है।  

इसके आठ रहस्य कौन से हैं?

अब बात करते हैं इससे जुड़े रहस्यों की। इसके विषय में ये सात मान्यताएँ इसके विषय में उत्सुकता और बढ़ा देती है:

1. पिरामिड या शिवलिंग जैसी आकृति

कैलाश पर्वत की आकृति पिरामिड से मिलती जुलती है। इस क्षेत्र के पर्वत शिखर नुकीले (pointed) हैं लेकिन कैलाश शिखर के पास से कुछ इस तरह मुड़ा है जिससे लगभग (पूरी तरह से नहीं) शिवलिंग की आकृति लगता है। गर्मियों में जब आसपास के पहाड़ों पर बर्फ पिघल जाती है तब भी कैलाश शिखर पर बर्फ होता है।

पुराणों और विशेष कर बौद्ध मत की ब्रजयान शाखा के अनेक ग्रन्थों और यंत्रों के विवरण से कुछ लोग अनुमान लगाते हैं कि यह प्रकृतिक पर्वत नहीं बल्कि मानव निर्मित हो सकता है। कुछ लोग मानते हैं कि पूरा का पूरा पहाड़ खोखला है। इसके अंदर एक बहुत ही उन्नत सभ्यता निवास करती है। यही वह नगर है जिसकी चर्चा विभिन्न ग्रन्थों में शंभाला आदि नामों से की गई है। अनेक लोग पुराणों में उल्लेखित इस रहस्यमयी शहर या सभ्यता को वास्तविक मान कर इसके खोज का प्रयास भी कर चुके हैं। इन लोगों में जर्मनी का हिटलर भी शामिल है। मान्यताओं के अनुसार चिंतामणि नामक विशेष रत्न, हनुमान और अश्वस्थामा जैसे चिरंजीवी भी इसी शहर में रहते हैं और यहीं कल्कि अवतार होगा। इन लोगों की तकनीक हमसे बहुत उन्नत है, वे अन्य ब्रह्मांडीय पिंडों से संपर्क कर सकते हैं, टेलीपैथी और टाइम ट्रैवल जैसा तकनीक जानते हैं और बहुत दिनों तक जी सकते हैं। उन्होने अपने इस क्षेत्र को एकांत रखना चाहा है।

डॉ एनर्स्ट मुल्दाशिफ की अगुवाई वाले रूस के वैज्ञानिक दल ने एक शोध पत्र प्रकाशित किया था। उसके अनुसार कैलाश पर्वत के चारों तरफ की ढाल या दीवार एक निश्चित माप में बनी हुए है। यह रचना पिरामिड से मिलती जुलती लगती है। ऐसी सटीक रचना प्रकृतिक रूप से किसी पहाड़ की नहीं हो सकती। इसे इन्सानों ने ही बनाया है। लेकिन वे कौन इंसान थे और कब, क्यों, कैसे बनाया यह हम नहीं जानते। उनके अनुसार ये एक अकेला पिरामिड नहीं है बल्कि 100 पिरामिडों का एक तंत्र है जिसमें कैलाश सबसे ऊंचा पिरामिड है जो कि केंद्र में बना है। रूसी दल के इस शोध पर आगे विस्तार से बात करेंगे।

डॉ एनर्स्ट मुल्दाशिफ

अन्य शोध के आधार पर इस पहाड़ का आधार ग्रेनाइट चट्टानों से बना है। यहाँ बर्फ की जो चट्टान है वह करीब 10,000 वर्ष पुरानी है।

2. डमरू और ॐ की आवाज

तीर्थयात्रियों को कैलाश पर्वत और मानसरोवर के आसपास निरंतर एक रहस्यमयी कंपन की तरह एक आवाज या गूंज सुनाई देती है। पहले ये आवाज दूर से आती हुई हवाई जहाज की आवाज सी लगती है। लेकिन ध्यान से सुनने पर ॐ की ध्वनि या डमरू की ध्वनि सी लगती है। कुछ वैज्ञानिक इसे बर्फ के पिघलने से आने वाली आवाज मानते हैं। लेकिन कुछ लोग इसे पर्वत के अंदर से आने वाली आवाज मानते हैं।

3. सात तरह की तीव्र रौशनी

कई लोगों ने बताया कि यहाँ रात के समय सात रंग की तेज रोशनी दिखाई देती है। यह संदेह व्यक्त किया गया है कि यह संभवतः चुम्बकीय बल के कारण हो।

4. हिम मानव

कई लोगों ने कैलाश के आसपास विशालकाय हिम मानव या यति को देखने का दावा किया है। लेकिन अभी तक इनका कोई ठोस प्रमाण नहीं मिल पाया है।

5. समय की तेज चाल  

कई लोगों ने दावा किया है कि यहाँ आने पर समय की गति बढ़ जाती है। लोग बहुत जल्दी बूढ़े दिखने लगते हैं। उनके नाखून और बाल के बढ़ने की गति धरती के अन्य स्थानों की तुलना में चार गुनी तक हो जाती है। साइबेरियन पर्वतारोहियों के एक दल ने ….. में इस पर्वत चढ़ने का प्रयास किया। वे अपने प्रयास में शिखर के पास तक पहुँच गए। हालांकि वे ऊपर तक नहीं चढ़ पाएँ लेकिन सबसे आश्चर्यजनक बात यह हुई कि वहाँ से लौटने के एक साल के अंदर भी इस टीम के सभी सदस्यों की मृत्यु हो गई। डॉक्टर के अनुसार उनकी मृत्यु अधिक आयु होने के कारण हुई थी लेकिन वास्तव में उनकी इतनी आयु थी नहीं। तो क्या वहाँ लगभग एक महीने तक रहने के कारण उनका शरीर इतना बूढ़ा हो गया जितना कई वर्षों तक पृथ्वी पर रहने से होता? उनकी मृत्यु आज भी रहस्य बना हुआ है।   

6. धरती का केंद्र

बौद्ध और हिन्दू ग्रन्थों में मेरु पर्वत को पृथ्वी का केंद्र कहा गया है। कहीं-कहीं यह भी संकेत मिलता है कि यह धरती के अन्य पर्वतों से और स्वर्ग से भी किसी तरह जुड़ा हुआ है। इस विषय पर रूस और अमेरिका के वैज्ञानिकों ने अध्ययन किया। यह पाया गया है कि ब्रिटेन स्थित स्टोन हेज, जो कि अपने आप में दुनिया का एक रहस्य है, की यहाँ से दूरी है 6,666 किमी। इतनी ही यानि कि 6,666 किमी की दूरी है उत्तरी ध्रुव की। 6,666 किमी का दुगुना यानि कि 13,332 किमी यहाँ से दक्षिणी ध्रुव दूर है। यह एक संयोग मात्र है या जैसा कि पवित्र ग्रन्थों में लिखा गया है यह पृथ्वी का मेरु है और यहाँ से ब्रह्मांडीय शक्तियों से संपर्क करना आसान है, यह अभी तक वैज्ञानिक रूप से साबित नहीं हो सका है।   

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7. ॐ और स्वस्तिक का बनना

कैलाश शिखर पर जब सूर्य अस्त होने लगता है और शिखर की छाया बनती है तो इसकी आकृति स्वस्तिक से मिलती जुलती लगती है। गर्मियों में जब बर्फ कुछ पिघल जाती है तब पहाड़ दक्षिण दिशा से देखने पर ॐ की आकृति दिखती है। धार्मिक दृष्टि से इसे देखने वाले इस क्षेत्र के पवित्र होने का यह प्रमाण मानते हैं। पर वैज्ञानिकों के अनुसार यह मात्र एक संयोग है।

8. मानसरोवर और राक्षस ताल के रहस्य

कैलाश के पास ही ये दोनों झील हैं। मानसरोवर और राक्षसताल के विषय में आश्चर्यजनक यह है दोनों आस पास हैं लेकिन दोनों के गुण एक दूसरे से विपरीत हैं।

मानसरोवर की आकृति लगभग गोल है जो सूर्य से मिलती जुलती है। इसका पानी बिलकुल ही शांत है, मीठा है। यह भीषण ठंढ में भी जमता नहीं है।

जबकि राक्षस ताल की आकृति अर्द्ध चंद्र की तरह है। इसका पानी समुद्र की तरह खारा है।

समान मौसम रहने पर भी मानसरोवर का जल शांत रहता है जबकि राक्षसताल के जल में लहरें उठती हैं। राक्षस ताल में कोई जीव जन्तु नहीं पाया जाता है।

ये दोनों मीठे और खारे पानी की दुनिया की क्रमशः सबसे ऊंची झील हैं।

इन दोनों को सकारात्मक और नकारात्मक ऊर्जा से जोड़ा जाता है। कहा जाता है कि राक्षस ताल का निर्माण स्वयं रावण ने करवाया था। उसने यहाँ स्नान कर ध्यान लगाया था। माना जाता है कि मानसरोवर में भगवान शिव और भगवान ब्रह्मा हंस का रूप धारण कर विचरण करते हैं। इसलिए इसे अत्यंत पवित्र माना जाता है।

दक्षिण दिशा से देखने पर इन दोनों झीलों के मिलने से स्वास्तिक की आकृति बनती हुई लगती है।

एक ही क्षेत्र के दो झीलों में इतना अंतर कैसे है, यह एक रहस्य बना हुआ है।

राक्षस ताल से लगभग 175 किमी दूर भारत के उत्तराखंड राज्य में रूपकुंड नामक एक झील है। इस झील में मनुष्यों के बहुत से कंकाल पाए जाते हैं। क्या कंकालों के इस झील का कैलाश और इसके इन दोनों झीलों से कोई संबंध है?

ऐसे रहस्यमय चीजों पर वैज्ञानिकों का ध्यान भी गया होगा और सच जानने के प्रयास भी हुए होंगे। अब जानते हैं ऐसे प्रयासों के बारे में।

कैलाश पर्वत पर अभी तक क्यों नहीं चढ़ा जा सका है? 

दुनिया के सबसे ऊंचे पर्वत माउंट एवरेस्ट पर तो अभी तक लगभग 7000 लोग चढ़ गए हैं। स्थानीय शेरपा लोग भी इस पर चढ़ते रहे हैं। लेकिन उससे 2200 मीटर कम ऊंचे कैलाश पर्वत पर अभी तक क्यों नहीं चढ़ा जा सका है? क्या हुआ जब हेलीकाप्टर से कैलाश पर जाने का प्रयास किया गया? सेटेलाइट ने क्या देखा?

इतने आश्चर्यजनक दावे वाले स्थान के लिए खोज के क्या क्या कोशिशें हुईं हैं? इस पर वैज्ञानिकों के मत क्या हैं? कैलाश पर्वत को जानने के इन सब प्रयासों पर हम आज बात करते हैं। 

शिखर पर चढ़ाई के लिए कानूनी प्रतिबंध

कैलाश पर चढ़ाई के प्रयास के दौरान होने वाली दुर्घटनाओं, मौतों और लोगों में इस पर्वत के प्रति  पवित्रता की धारणाओं के कारण चीन सरकार ने 2001 से इस पर किसी भी तरह की चढ़ाई को प्रतिबंधित कर दिया। साथ ही इससे संबन्धित सभी खोजी प्रयास रोक दिए गए हैं। 

कैलाश शिखर पर चढ़ने वाला इकलौता व्यक्ति

अभी तक इस पर चढ़ने के अनेक प्रयास हो चुके हैं लेकिन लेकिन ऐतिहासिक काल से आज तक कैलाश पर एक को छोड़ कर किसी का चढ़ना ज्ञात नहीं है। 

इतिहास में केवल एक तिब्बती योगी मिलारेपा द्वारा 12वीं शताब्दी में इस पर चढ़ने का विवरण है। लेकिन वह वहाँ बहुत कम देर रहे। उन्होने कभी इसके विषय में न तो अधिक कुछ कहा और न ही वह चाहते थे कि कोई और भविष्य में उस पर चढ़े। उनके साथ प्रतिस्पर्था कर चढ़ने वाला व्यक्ति नारो बॉन चुंग शिखर के पास जाकर कुछ अलौकिक कारणों से ऊपर नहीं जा सका। 

कैलाश संबंधी अन्वेषण

ब्रिटिश भारत सरकार द्वारा

भारत, नेपाल और तिब्बत के लोग प्राचीन काल से मानसरोवर की यात्रा करते थे। लेकिन 20वीं शताब्दी में इस पर अधिकार का दावा चीन और ब्रिटिश भारत की सरकार करने लगी। 1926 में अल्मोड़ा के उपायुक्त (डेप्युटी कमिश्नर) ह्यू रटलेज (Hugh Ruttledge) ने तिब्बत की यात्रा की। वह नगरी नामक स्थान के एक स्थानीय नेता, जिन्हें तिब्बती लोग गार्पोन (Garpon) कहते हैं, से मिलने गए थे। लेकिन उस समय गार्पोन कहीं बाहर गए थे। ह्यू ने कैलाश पर्वत की परिक्रमा करते हुए उसका अध्ययन किया। उनके अनुसार यह पर्वत लगभग 6,000 मीटर अथवा 20,000 फिट ऊंचा है लेकिन इस पर चढ़ना लगभग असंभव है। इसके उत्तरपूर्व दिशा से चढ़ने की संभावना का पता लगाने के लिए कर्नल आर॰ सी॰ विल्सन एक शेरपा के साथ थे। पहले तो उन्होने दावा किया कि उन्होने चोटी पर चढ़ने का रास्ता खोज लिया है। पर भारी हिमपात के कारण उनके लिए भी चढ़ाई असंभव हो गया।

1936 में हर्बर्ट टिची (Herbert Tichy) ने फिर कैलाश पर चढ़ने का प्रयास किया। स्थानीय गार्पोन ने उसे बताया कि “यह केवल बर्फ की दीवार पर चढ़ना नहीं है बल्कि जो सभी तरह के पापों से मुक्त होगा वही इस पर पक्षी की तरह उड़ कर इसकी चोटी पर चढ़ सकेगा।”

चीन सरकार द्वारा

1950-51 में चीन ने तिब्बत पर कब्जा कर लिया। कैलाश पर्वत तिब्बत का ही भाग है। इसके बाद चीन सरकार की अनुमति आवश्यक हो गई इस पर शोध करने के लिए। 

1980 के दशक के मध्य में चीन सरकार ने इटली के एक बहुत ही प्रसिद्ध पर्वतारोही रेनहोल्ड मेसनर जो कि माउंट एवरेस्ट पर अकेले और बिना मास्क के चढ़ने वाले पहले पर्वतारोही थे, को इस पर चढ़ने का अवसर दिया लेकिन नजदीक पहुँच कर उन्होने यह कह कर मना कर दिया कि “अगर हम इस पर्वत पर विजय प्राप्त करते हैं तो हम लोगों की आत्माओं में कुछ जीत लेंगे।”

2001 में स्पेनिश पर्वतारोहियों के एक दल ने इस पर चढ़ने का प्रयास किया। लेकिन वह सफल नहीं हो सकी।

आज तक कोई मनुष्य इस पवित्र पर्वत पर नहीं चढ़ पाया। जिसने भी चढ़ने की कोशिश की, उसकी मृत्यु हो गई। कहा जाता है कि 19 वीं और 20 वीं सदी के शुरू में कुछ पर्वतारोहियों ने इस पर चढ़ने की कोशिश की थी और गायब हो गए थे।

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चीन द्वारा कैलाश पर हेलिकॉप्टर भेजना

कैलाश पर्वत के ऊपर प्लेन या हेलिकॉप्टर उड़ाना मना है क्योंकि इस क्षेत्र में अचानक मौसम बदलता है जो खतरनाक हो सकता है। लेकिन जब चीन ने देखा कि कोई मानव अभियान दल इस पर चढ़ नहीं पा रहा है तो उसने इस पर एक खोजी दल के साथ हेलिकॉप्टर भेजने का निश्चय किया। कई महीने तक रिसर्च के बाद साफ मौसम के पूर्वानुमान के बाद जब हेलिकॉप्टर उड़ा तब पहले तो मौसम अच्छा था, लगा यह दल शिखर को नजदीक से देख पाएगा। लेकिन अचानक मौसम बहुत खराब हो गया, बादल घिरने लगे और पर्वत पर हिमस्वखलन के दृश्य दिखने लगे। हेलिकॉप्टर हिम्मत कर आगे बढ़ता गया। पर हिमपात और काले काले बादलों से यह घिर गया। कुछ भी देख सकना असंभव हो गया। ऊंचाई पर हवा का दबाव इतना बढ़ गया कि हेलिकॉप्टर नियंत्रित करना कठिन हो गया। चीन के वैज्ञानिकों ने बताया कि इसकी भौगोलिक स्थिति ऐसे है कि ऊंचाई पर जाकर सभी दिशाएँ एक सी हो जाती है। कम्पास काम करना बंद कर देता है। उन्हें दिशाभ्रम हो गया। अंततः उन्होने वापस आने का निर्णय लिया। इसके बाद फिर कोई ऐसा अभियान नहीं भेजा गया।

1999 का रूसी अभियन दल

कैलाश संबंधी रहस्यों को रूसी शोधकर्ताओं के विचारों से सबसे अधिक समर्थन मिला। 1999 में रूस के एक नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ एनर्स्ट मुल्दाशिफ ने यह तय किया कि वे कैलाश पर्वत के रहस्यों को खोलने के लिए उस इलाके में जाएंगे। उनकी पर्वतारोहण टीम में भूविज्ञान व भौतिकी के विशेषज्ञ और इतिहासकार शामिल थे। इस दल के सदस्यों ने कई तिब्बती लामाओं से मुलाकात की। पवित्र कैलाश पर्वत के आसपास कई महीने बिताए।

वापस आने पर मुल्दाशिफ ने एक किताब लिखी, व्हेयर डू वी कम फ्राम। इसमें उन्होंने कैलाश यात्रा की काफी चर्चा की है। उन्होने दावा किया कि कैलाश पर्वत वास्तव में एक प्राचीन मानव निर्मित पिरामिड है, जो अनेक छोटे-छोटे पिरामिडों से घिरा हुआ है। इसके तार गीज़ा व मैक्सिको के टिओथ्युआकान के पिरामिडों से जुड़े हैं।

एर्नस्ट मुल्दाशिफ ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि उन्हें एक बार साइबेरियाई पर्वतारोही ने बताया था कि कुछ पर्वतारोही कैसे कैलाश पर्वत पर एक निश्चित बिन्दु तक पहुँचे। उसके बाद वे अचानक बूढ़े दिखाई देने लगे। इसके एक साल बाद ही बुढ़ापे की वजह से उनकी मृत्यु हो गई।

उनकी टीम इस निष्कर्ष पर पहुँची कि वास्तव में कैलाश पर्वत पारलौकिक गतिविधियों का केन्द्र है। उन्होने लिखा “रात की ख़ामोशी में पहाड़ के भीतर से एक अजीब तरह की फुसफुसाहटों की आवाज़ सुनाई देती है। एक रात अपने दोनों सहयोगियों के साथ मैंने साफ़-साफ़ पत्थरों के गिरने की आवाज़ सुनी थी। यह आवाज़ कैलाश पर्वत के पेट के भीतर से सुनाई दे रही थी। हमें ऐसा लगा कि जैसे इस पिरामिड के अन्दर कुछ लोग रहते हैं।

इसी लेख में उन्होने आगे लिख, “तिब्बती ग्रन्थों में लिखा हुआ है कि शम्बाला एक आध्यात्मिक देश है, जो कैलाश पर्वत के उत्तर-पश्चिम में स्थित है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से इस विषय पर चर्चा करना मेरे लिए मुश्किल हैमैं पूरी सकारात्मकता से यह कह सकता हूँ कि कैलाश पर्वत का इलाका सीधे-सीधे पृथ्वी के जीवन से जुड़ा हुआ है

जब हमने सिद्धों और तपस्वियों के राज्य’ तथा ‘पिरामिडों और पत्थरों के दर्पण’ को साथ मिलाकर देखा तो हम हैरान रह गए क्योंकि यह योजनाबद्ध नक्शा डीएनए के अणुओं की संरचना का नक्शा था।”

कैलाश पर्वत और उसके आस पास के वातावरण पर अध्ययन कर रहे वैज्ञानिक ज़ार निकोलाइ रोमनोव और उनकी टीम ने तिब्बत के मंदिरों में धर्मं गुरुओं से मुलाकात की। उन्होंने बताया कैलाश पर्वत के चारों ओर एक अलौकिक शक्ति का प्रवाह होता है जिसमें तपस्वी आज भी आध्यात्मिक गुरुओं के साथ टेलीपैथी से संपर्क करते हैं।

निकोलाय रेरिख़

प्रसिद्ध रूसी चित्रकार निकोलाय रेरिख़ को यह विश्वास था कि कैलास के आसपास के इलाके में शम्बाला नाम का एक रहस्यमयी राज्य है। हिंदुओं के कुछ संप्रदाय इस शम्बाला राज्य को कपापा के नाम से पुकारते हैं, जहाँ सिर्फ़ सिद्ध और तपस्वी ही रहते हैं।

रूसी पर्वतारोही सर्गेई सिस्टियाकोव की तबीयत चोटी के करीब पहुँच अचानक खराब होने लगी। उन्हें कमजोरी और बेचैनी महसूस होने लगी एवं दिल की धड़कन बढ़ने लगी। जैसे-जैसे नीचे आते गए उनकी तबीयत ठीक होती गई।

रूसी शोधकर्ताओं के इन दावों से कैलाश के रहस्यों पर दुनिया भर के लोगों की रुचि बढ़ने लगी। साथ ही इस पर और भी बहुत से दावे किए जाने लगे।   

नासा की खोज

2015 में अमेरिकी अन्तरिक्ष एजेंसी नासा में अपने सेटेलाइट को कैलाश पर्वत पर फोकस कर दिया। लेकिन उसे कोई विशेष या असामान्य गतिविधि नहीं दिखा। पर सूर्यास्त के समय जो शिखर की जो प्रतिछाया पड़ती है उसे वैज्ञानिक केवल छाया मानते हैं लेकिन कुछ अस्थावान हिन्दू इसकी तुलना भगवान शिव के ध्यानमय अवस्था से करने लगे। पर इंटरनेट पर नासा के नाम से जो अधिकांश फोटो और वीडियो वायरल हो रहा है जिस पर शिव विभिन्न रूपों में कैलाश पर दिखाई दे रहे हैं, उनमें से अधिकांश फेक हैं और कंप्यूटर द्वारा बनाए गए हैं।  

क्यों नहीं चढ़ा जा सका है कैलाश शिखर पर   

वैज्ञानिकों के अनुसार यहाँ तेजी से बदलने वाले मौसम और सभी तरफ से खड़ी ढाल के कारण इस पर पहुँचना कठिन है। चट्टानों के किनारे बर्फ से ढंके होते हैं। यहाँ मैगनेटिक फील्ड ज्यादा सक्रिय हैं जिस कारण चढ़ाई और कठिन हो जाती है। तेजी से बदलते मौसम के कारण यहाँ कम्पास जैसे यंत्र काम नहीं करते।

जबकि आध्यात्मिक-धार्मिक मान्यता वाले लोगों के अनुसार कैलाश के आसपास अलौकिक ऊर्जा है जिस कारण यहाँ पहुँचना कठिन है। अनेक बौद्ध संत मानते हैं कि यहाँ केवल वही पहुँच सकता है जो पुण्यात्मा हो और जिसने उच्च आध्यात्मिक सिद्धि प्राप्त की हो। यह भी कहा जाता है कि यहाँ अमर या चिरंजीवी लोग ही जा सकते हैं साधारण मर्त्य मनुष्य नहीं। चूंकि यह देवताओं का निवास है इसलिए इस पर किसी साधारण व्यक्ति को जाना नहीं चाहिए। दैवी प्रकोप के कारण ही अभी तक कोई इस पर नहीं चढ़ पाया है और अगर कोई इसके नजदीक भी गया है तो किसी दुर्घटना या मृत्यु का शिकार हो गया।

कई पर्वतारोहियों ने दावा किया कि ऊपर चढ़ने का प्रयास करते समय उन्हें दिशा और समय का भ्रम होने लगा, लगने लगा जैसे शिखर अपना स्थान बदल रहा हो, रास्ते खो गए और ऊपर चढ़ नहीं सके। इसकी व्याख्या वैज्ञानिक और आस्था अपने अपने अनुसार करते हैं। 


कैलाश के विषय में विभिन्न दावे और वैज्ञानिकों के इस पर विचार

सेटेलाइट या अन्य माध्यम द्वारा अभी तक यह केवल एक शांत पर्वत दिखता है। इस पर किसी प्राणी के होने या कोई असामान्य घटना होने के कोई प्रमाण नहीं मिला है। आधुनिक तकनीकों से अभी यह पता नहीं लगाया जा सका है कि कैलाश पर्वत अंदर से खोखला है या यह मानव निर्मित है। इसलिए अभी तक इन मान्यताओं का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं मिला है।