एक कमरे में चार दिये जल रहे थे। उस समय परिवार का कोई भी सदस्य उस कमरे में नहीं था। घर के सभी सदस्य आपस में लड़ते-झगड़ते रहते थे। उस दिन भी लड़ाई के बाद सभी गुस्से में थे। कोई किसी से कुछ बोल नहीं रहा था। घर का ये हाल देख कर दीयों को अच्छा नहीं लगा। वे सभी उदास थीं।
एक दिया बोली, “मैं शांति हूँ। पर इस घर को अब मेरी कोई जरूरत नहीं है। इसलिए मैं अब यहाँ नहीं रहना चाहती।” इतना कह कर वह दिया बुझ गई।

दूसरी दिया भी उदास थी। उसने कहा, “मैं विश्वास हूँ। इस घर में सभी एक-दूसरे पर क्रोध और शक करते हैं, किसी को किसी पर विश्वास नहीं है। अब यहाँ अब मेरा क्या काम है?” ऐसा कहते हुए विश्वास का दिया भी बुझ गई।
दोनों के बुझ जाने से कमरे रौशनी बहुत कम हो गई। शांति और विश्वास के जाने से प्रेम की दिया और भी अधिक दुखी हो गई। वह बोली, “इस घर में न तो शांति है न ही विश्वास, फिर यहाँ प्रेम का क्या काम?” ऐसा कह कर वह भी बुझ गई।
कमरे का अंधकार और भी बढ़ गया। पर चौथी दिया जिसका नाम आशा था, वह अभी भी जल रही थी। उसे आशा थी कि एक दिन इस घर में सब ठीक हो जाएगा और सब फिर खुशी से रहेंगे। वह अकेली थी, इसलिए कमरे में रौशनी अब बहुत कम थी लेकिन टिमटिमाते हुए ही सही, आशा का दिया अंधेरे को रोके हुए थी।
तभी घर का एक बच्चा दौड़ता हुआ उस घर में आया। उसने देखा घर में केवल एक दिया टिमटिमा रही थी। उस एक अकेले दिए की रोशनी इतनी तो नहीं थी कि वह अंधेरे को दूर कर सके पर उस दिए से बाकी दीयों को जलाया जा सकता था। बच्चे ने आस के उस दिये से शांति, विश्वास और प्रेम के दीयों को फिर से जला दिया।
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