अब घंटी किसके लिए बजेगी?

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उमा खुराना। क्या यह नाम याद है आपको? अगर नहीं तो गूगल कर लीजिए। यह एक शिक्षिका थी। एक टीवी चैनल ने तथाकथित स्टिंग ऑपरेशन के आधार पर इन पर आरोप लगाया कि ये अपने ही स्कूल की छात्राओं को देह व्यापार में लगा रही थी। सारे देश में इनकी थू थू होने लगी। मीडिया चिल्लाने लगे। उस स्कूल में पढ़ने वाले बच्चियों के अभिभावक उनकी जान के प्यासे हो गए और स्कूल के बाहर उनकी जान लेने के इरादे से जमा हो गए जब कि वह स्कूल के अंदर क्लास ले रही थी। बाद में पुलिस ने घायल अवस्था में बड़ी मुश्किल से उन्हें उस भीड़ से बचा कर हॉस्पिटल में एडमिट करवाया। हॉस्पिटल से छुट्टी मिलते ही उन्हें जेल भेज दिया गया।

लेकिन बाद में पता चला कि स्टिंग ऑपरेशन में दिखाई गई लड़की वहाँ की न तो स्टूडेंट थी न ही उमा उसे जानती थी। बल्कि किसी और व्यक्ति से उनका पैसों का कुछ लेनदेन था। उसने एक बार उस लड़की को जॉब के लिए उनसे मिलाया था। लेकिन दो समय के वीडियो को एक साथ कर इस तरह दिखाया गया कि पैसों की बात उस लड़की के लिए हो रही थी।

पहले तो स्टिंग ऑपरेशन करने वाले पत्रकार ने इसके झूठ होने को सिरे से ही नकार दिया फिर बाद में झूठ की सारी ज़िम्मेदारी अपने किसी अधीनस्थ पर डाल कर खुद को पाक साफ घोषित कर दिया।

धीरे-धीरे लोग इस ‘घटना’ को भूल गए। वह पत्रकार एक बड़ा नाम बन गया ‘सुधीर चौधरी’। सब कुछ नॉर्मल चलता रहा सबके लिए, लेकिन उमा खुराना को छोड़ कर। इस घिनौने आरोप से एक सीधी सादी घरेलू जिंदगी जीने वाली महिला, उसके दोनों बच्चों और परिवार पर क्या असर पड़ा? क्या परिवार इस त्रासदी को कभी भूल पाया? समाज में वह सम्मान पा सका? इस पर सोचने के लिए किसी के पास समय नहीं था। पत्रकार और चैनल का काम तो हो गया। उनकी व्यू और टीआरपी बढ़ गई। किसी को कोई सजा नहीं।

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यह एक घटना या अपवाद नहीं बल्कि ऐसे सैकड़ों नहीं हजारों मामले मिलते हैं। सरकार हो, मीडिया हो या फिर सोशल मीडिया। किसी के सम्मान को, उसकी विश्वसनीयता को खत्म करना कितना आसान है। अब तो एआई आदि तकनीक से स्टिंग ऑपरेशन करने के मेहनत की जरूरत भी नहीं है।

हम तब तक इसकी चिंता नहीं करते जब तक यह आंच हम तक नहीं पहुँचती। इसका सबसे हालिया उदाहरण है सोनम वांगचुघ। पुराने फोटो, क्लिप आदि के आधार पर उनको देश द्रोही कह दिया गया। उनके एनजीओ पर जो आरोप है उसे पढ़ कर ही ऐसा लगता है कि बहुत कोशिश करने पर भी कोई ठीक ठाक सा आरोप भी नहीं लगाया जा सका है। विदेश से मिले कुछ पैसों को रिफ़ंड कर देना, खाद्य संप्रभुता की बात करना आदि। वह भी कई साल पुरानी बातों को जिन पर अभी तक सरकार सो रही थी।

जांच तो किसी की विश्वसनीयता को खंडित करने का एक जरिया भी होता है। आखिर कितने जांच के बाद आरोप साबित हो पाते हैं? पता नहीं सरकार की जांच एजेंसियां सक्षम नहीं होती या फिर कोर्ट? पर वर्षों बाद अगर आरोप झूठे साबित होते हैं तो यह अन्याय आरोपी के प्रति भी है और विक्टिम के प्रति भी।

कई लोग कह रहे हैं कि लेह हिंसा की जांच तो हो ही रही है। जांच के दौरान आरोपी को जेल में रखना भी साधारण प्रक्रिया की बात ही तो है। लेकिन इस दौरान यह भूल जाते हैं कि जो लोग मरे और घायल हुए उन पर से सबका ध्यान हट गया। किसी ने उनके लिए संवेदना भी प्रकट करने का जहमत नहीं उठाया क्योंकि वो तो दंगाई थे। बिलकुल वैसे ही जैसे एक धुंधले फोटो के आधार पर प्रेस कोन्फ्रेंस कर यह कह दिया गया कि वह विपक्षी दल का पार्षद है, भले ही वह पार्षद चिल्लाता रहा यह मैं नहीं हूँ, वांगचुघ समझाता रहा कॉंग्रेस का इतना प्रभाव ही नहीं है, वैसे ही कह दिया गया मरने वाले कुछ बाहरी थे इसलिए दंगे करने वाले भी बाहरी लोग थे। बाहरी मतलब? देश से बाहरी? या लद्दाख से बाहरी? कौन थे? कहाँ से आए थे? कोई टुरिस्ट तो नहीं थे जो फंस गए हों दंगे में?

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पाँच साल से वांगचुघ अनशन के नाम पर भूखे मर रहा था, न सरकार को पड़ी थी न ही मीडिया को। केवल कुछ यूट्यूब वाले ही इस बारे में थोड़ा बहुत बता रहे थे। लेकिन आग लगते ही वहाँ चीन, पाकिस्तान, अमेरिका जैसे सभी देश विरोधी तत्व सबको दिखने लगे। हमें सब कुछ दिख रहा है केवल वहाँ के लोगों की पीड़ा नहीं दिख रही है। वह भी तब जबकि यह सामरिक दृष्टि से सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में से है।

वांगचुघ ने वर्षों में जो सम्मान कमाया, एक झटके में जांच और आरोप के द्वारा उसे खत्म कर दिया गया। पता नहीं कब, किसका नंबर आ जाए।

मैं केवल सम्मान की बात कर रही हूँ, जान की नहीं। जान का क्या है, वह तो लोगों के पैरों तले कुचल कर, गाड़ियों से दब कर, कचड़े से दब कर, गड्ढे में गिर कर, पुल, फ़्लाइओवर आदि के नीचे आकर, या फिर बाढ़ में डूब कर कभी भी जा सकती है।